SHIKANJE KA DARD

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ISBN:978-93-5000-719-8

Author:SUSHILA TAKBHORE

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MRP:Rs.495/-

Stock:In Stock

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Details

बस की अगली सीट पर एक औरत बच्चा लिये हुए बैठी थी। बच्चालगभग एक बरस का होगारो रहा था।साथ में एक अधेड़ उम्र की महिला उसके साथ थी।अधेड़ महिला शायद उसकी माँ या सास हो।महिला का पति बस की दूसरी सीट पर बैठा था। बच्चे को चुप कराने के लिए पति ने बच्चे को लिया।पहले अधेड़ महिला ने भी कोशिश की।लेकिन बच्चा चुप नहीं हुआ। अगले स्टॉप से बस में एक व्यक्ति चढ़ा। बच्चे को रोता देख कर व्यक्ति ने कहा पानी पिलाओ। बच्चे के पिता ने पानी पिलाया तब बच्चा चुप हो गया। इस बात से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जीवन में अनुभव का एक विशेष महत्त्व है। जिसने जीवन को समझ करजिया है वह जीवन की स्पष्ट परिभाषा दे सकता है। इसी प्रकार अनुभवों पर आधारितशिकंजे का दर्दप्रस्तुत है जिसमेंलेखिका सुशीला टाकभौरे ने अपनी जीवनी के माध्यम से दलित और शोषित समाज को एक समाजशास्त्रीय ढंग से वर्णित किया है।लेखिका कहती है किशिकंजे का दर्दलिखने का उद्देश्य दर्द देने वाले शिकंजे कोतोड़ने का प्रयास है।दुनिया एक कैदखाना हैऐसा कैदखाना जिसे ईश्वर ने बनाया है।इसमें एक मानव निर्मित कैदखाना भी हैजिसे इन्सान ने बनाया है।मानवनिर्मित कैदखाने से निकलना तो आसान हैलेकिन ईश्वर द्वारा निर्मित कैदखाने से बाहर आना इतना आसान नहीं।पुस्तकशिकंजे का दर्दशिकंजा यानी पंजाजिसकी जकड़न में रहकर कुछ कर पाना कठिन हो।शिकंजा यानी कठघरा जिसमें कैद होकर उसके बाहर जाना कठिन हो।शब्दकोश में दिए अर्थ के अनुसार शिकंजे का अर्थ दबानेकसने का यंत्र है।शिकंजे का अर्थ एक प्रकार का प्राचीन यंत्र है जिसमें अपराधी की टाँग कस दी जाती है। शिकंजा वह यंत्र है जिसमें धुनकने के पहले रुई को कसा जाताहै। शिकंजे का अर्थ कोल्हू भी है। जिस तरह किसी ताकतवर को शिकंजे में जकड़कर उसकी पूरी ताकत को नगण्य बना दिया जाता हैउसी तरह लेखिका को भी सामाजिक जीवन की मनुवादी विषमता नेवर्णवादी-जातिवादी समाज व्यवस्था ने शिकंजे में जकड़कर रखाजिसका परिणाम पीड़ा-दर्दछटपटाहट के सिवा कुछ नहीं है।सदियों के मूक मानव अब बोलने लगे हैंअपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगे हैंप्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए अपनी व्यथा-कथा लिखने लगे हैं। प्रश्न है क्या प्रत्येक दलित पीड़ित को उसके मानवाधिकार मिल रहे हैंक्या दलित शोषण की घटनाएँ रुकी हैंविषमतावादी भारतीय समाज में जातिभेदऊँच-नीच की भावनाएँ क्या अब नहीं हैंशिकंजे का दर्दमें संताप है दलित होने कास्त्री होने का। इसमें शोषितपीड़ितअपमानितअभावग्रस्त दलित जीवन की व्यथा है। स्त्री होना ही जैसे व्यथा की बात है। चाहे हमारा देश हो या विश्व के अन्य देशहर जगह शोषणउत्पीड़न का शिकार स्त्री ही रही है। जिस देश में वर्णभेदजातिभेद की कलुषित परम्पराएँ हैंवहाँ दलित स्त्रीशोषण की व्यथा और भी गहरी हो जाती है। सदियों से तिरस्कृत और अभावग्रस्त परिस्थितियों में रहने के लिए मजबूर किये गये दलित जीवन की व्यथा-कथा का दर्दशिकंजे का दर्दमें समाहित है।

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About the writer

SUSHILA TAKBHORE

SUSHILA TAKBHORE जन्म: 4 मार्च, 1954, बानापुरा (सिवनी मालवा), जि. होशंगाबाद (म.प्र.)। शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी साहित्य), एम.ए. (अम्बेडकर विचारधारा), बी.एड., पीएच.डी. (हिन्दी साहित्य)। प्रकाशित कृतियाँ: स्वाति बूँद और खारे मोती, यह तुम भी जानो, तुमने उसे कब पहचाना (काव्य संग्रह); हिन्दी साहित्य के इतिहास में नारी, भारतीय नारी: समाज और साहित्य के ऐतिहासिक सन्दर्भों में (विवरण); परिवर्तन जरूरी है (लेख संग्रह); टूटता वहम, अनुभूति के घेरे, संघर्ष (कहानी संग्रह); हमारे हिस्से का सूरज (कविता संग्रह); नंगा सत्य (नाटक); रंग और व्यंग्य (नाटक संग्रह); शिकंजे का दर्द (आत्मकथा); नीला आकाश, तुम्हें बदलना ही होगा (उपन्यास)। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में सृजनात्मक गतिविधियाँ; दलित समाज और नारी की स्थिति पर परिवर्तनवादी आन्दोलन में वैचारिक सक्रियता; आकाशवाणी से समय- समय पर परिचर्चाएँ प्रसारित। म.प्र. के मुख्यमन्त्री दिग्विजय सिंह द्वारा ‘म.प्र. दलित साहित्य अकादमी विशिष्ट सेवा सम्मान’ एवं पुरस्कार। रमणिका फाउंडेशन से ‘सावित्री बाई फुले’ सम्मान एवं पुरस्कार। सम्पर्क: शील-2, गोपालनगर, तीसरा बस स्टॉप, नागपुर-22 (महाराष्ट्र) मो.: 09422548822, 0712-2230444

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