LUCKNOW MERA LUCKNOW

Format:Hard Bound

ISBN:81-7055-940-5

Author:MANOHAR SHYAM JOSHI

Pages:128

MRP:Rs.250/-

Stock:In Stock

Rs.250/-

Details

लखनऊ मेरा लखनऊ

Additional Information

ख़ैर तो साहब, जोशी जी लेखक-वेखक बन गये। गोष्ठियों में जाने लगे। कॉफी हाउस में कॉफी पिलानेवालों की संगत करने लगे। लेखक बनने के लिए तब का लखनऊ एक आदर्श नगर था। यशपाल, भगवती बाबू और नागर जी ये तीन-तीन उपन्यासकार वहाँ रहा करते थे। तीनों से जोशी जी का अच्छा परिचय हो सका। शुरू में यशपाल उनके पड़ोसी रहे थे और इन तीनों में यशपाल ही प्रगतिशीलों के सबसे निकट थे। इसके बावजूद यशपाल से ही जोशीजी सबसे कम परिचय हो पाया। यशपाल उन्हें थोड़े औपचारिक-से, शुष्क-से और साहिबनुमा-से लगे। इसकी एक वजह शायद यशपाल जी की रोबीली और कुछ घिसी-घिसी-सी आवाज रही हो। यशपाल जी ने भी उन्हें कभी खास 'लिफ्ट' नहीं दी। यशपाल जी से कहीं ज़्यादा निकटता जोशी जी ने उनकी पत्नी और उनकी बेटी मंटा से अनुभव की। अल्हड़ मण्टा लखनऊ लेखक संघ के सभी सदस्यों को बहुत प्यारी लगती थी, रघुवीर सहाय ने तो उस पर कभी कुछ लिखा भी था। भगवती बाबू से जोशी जी की बहुत अच्छी छनी। बावजूद इसके कि तब भगवती बाबू कांग्रेसी थे और उस दौर के कम्युनिस्टों के लिए कांग्रेस 'समाजवादी' नहीं, किसानों-मजदूरों का दमन करनेवाली पार्टी थी। भगवती बाबू से जोशी जी की अच्छी छनने का सबसे बड़ा कारण यह था कि वह नयी पीढ़ी के लेखकों से मित्रवत् व्यवहार करते थे। उन्हें 'अमाँ-यार'। कहकर सम्बोधित करते थे और उनके साथ बैठकर खाने-पीने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था। खूब हँसते-हँसाते थे। हँसते इतने ज़्यादा थे कि उनकी आँखों में पानी भर आता था। हँसने से बाहर आते पान के मलीदे को उन्हें बार-बार ओठों से भीतर समेटना पड़ता और कभी-कभी अपने या सामनेवाले के कपड़े रूमाल से पोंछने पड़ जाते। हँसते-हँसाते नागर जी भी बहुत थे लेकिन नये लेखकों के साथ उनका व्यवहार चचा-ए-बुजुर्गवार का ही होता था, भगवती बाबू की तरह चचा-ए-यारवाला नहीं। गप्प-गपाष्टक का शौक भगवती बाब को नागर जी के मुकाबले में कहीं ज़्यादा था। अफ़सोस कि इतने भले और दोस्ताना भगवती बाबू को भी जोशी जी ने व्यंग्य-बाणों का पात्र बनाया।

About the writer

MANOHAR SHYAM JOSHI

MANOHAR SHYAM JOSHI मनोहर श्याम जोशी 9 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्रा जीवन से ही लेखक और पत्राकार बन गये। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आषीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21वें वर्श से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गये। प्रेस, रेडियो, टी.वी., वष्त्तचित्रा, फिल्म, विज्ञापन-सम्प्रेशण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विशय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया है। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्श के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्श के होने आये। केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतन्त्रा लेखन करते रहे । निधन: 30 मार्च 2006।

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