AADIVASIYON KI PARAMPARIK SWASHASAN VYAWASTHA EVAM PANCHAYATI RAJ

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5229-422-0

Author:ED. SUDHIR PAL, RANENDRA

Pages:104

MRP:Rs.300/-

Stock:Out of Stock

Rs.300/-

Details

झारखण्ड में परंपरागत स्वशासन की परम्परा है। समय के साथ इसके स्वरूप में बदलाव जरूर आया है लेकिन मूल में ग्राम स्तर पर अपना शासन ही रहा। सामुदायिक और सामूहिक भागीदारी इस परम्परागत लोकतांत्रिक स्वशासन का आधार है। परम्परागत स्वशासी व्यवस्था न सिर्फ राजनैतिक संगठन है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों तथा संसाधनों तक लोगों की पहुंच और संसाधनों को गांव के हित में इस्तेमाल करने का एक निकाय भी है। तकरीबन सभी जनजातीय गांवों में किसी-न-किसी रूप में स्वशासी व्यवस्था कायम है। परम्परागत प्रधान हैं और तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी परम्परागत स्वशासी व्यवस्था आज भी विद्यमान है। झारखण्ड के 50 फीसदी से ज्यादा इलाके अनुसूचित क्षेत्रा हैं और पेसा के तहत आते हैं। यहां परम्परागत स्वशासी व्यवस्था भी किसी-न-किसी रूप में कायम है। त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था और आदिवासी स्वशासी व्यवस्था के अंर्तसंबंधों को लेकर राज्य में व्यापक बौद्धिक बहस छिड़ी हुई है। वॉलेन्ट्री सर्विसेज ओवरसीज (वी.एस.ओ.) ने स्वयंसेवी संस्था मंथन युवा संस्थान के साथ मिलकर झारखण्ड में परंपरागत स्वशासी व्यवस्था को अनुसूचित क्षेत्रा में पंचायती राज विस्तार अधिनिम (पेसा) के परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने और दोनों व्यवस्थाओं की विशिष्टताओं और विविधताओं के बीच अंर्तसंबंध तलाशने के उद्देश्य से एक अध्ययन किया। लगभग 18 महीने के इस अध्ययन में झारखण्ड की पांच जनजातीय समुदायों उरांव, मुण्डा, हो, संताल और पहाड़िया की परंपरागत व्यवस्था को नजदीक जानने-समझने की कोशिश की गई। इस अध्ययन से हमारी समझ बनी है कि यदि परंपरागत स्वशासी व्यवस्था से जुड़े लोगों को विकास के परिप्रेक्ष्य में क्षमतावर्द्धन किया जाय और विकास एजेन्सियों के साथ तारतम्य और अंर्तसंबंध विकसित किये जाएं तो पेसा के मूल उद्देश्यों के आलोक में कमजोर समुदायों के सशक्तीकरण का मार्ग प्रशस्त हो पायेगा।

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