ATHATO SAUNDARYA JIGYASA

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-020-2

Author:DR. RAMESH KUNTAL MEGH

Pages:

MRP:Rs.750/-

Stock:Out of Stock

Rs.750/-

Details

कभी-कभी हर व्यक्ति सचेतन अथवा अनजाने ही सौंदर्य-असौंदर्य, भीषण-उदात्त, आनंद-आतंक के उन अंतर्विरोधों के बीच से गुजरता रहता है, जो उसके दैनिक अनुभव या चिंतन या प्रतिकर्म के साझेदार हैं। इंसानी ज्ञान और उसके कलाकर्म ने इन्हें कलाकृतियों में तथा ‘सौंदर्यबोधशास्त्र’ (एस्थेटिक्स) के दार्शनिक एवं प्रतीकात्मक सवरूपों में समन्वित करके सदियों से विभिनन देशांे तथा संस्कृतियों में गूंथा है। इस पुस्तक में सौंदर्यबोधात्मक वृत्ति तथा सौंदर्यबोधनुभव की दोनों महाधुरियों का सामंजस्य करके भारतीय तथा पाश्चात्य संदर्भ में ‘कला और साैंदर्य’ से संबद्ध सभी पक्षों का एकतान निरूपण तथा अनुशीलन हुआ है। ‘अथातो सौंदर्यजिज्ञसा’ हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्र’ के अध्ययन और अन्वेषण की तथा साहित्य-कला-सौंदर्य के अधुनातन पाठ्यक्रम की पहली प्रवेशक पुस्तक है।

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DR. RAMESH KUNTAL MEGH

DR. RAMESH KUNTAL MEGH रमेश कुंतल मेघ पचहत्तर पार। जाति-धर्म-प्रान्त से मुक्त। देश-विदेश के चौदह-सोलह शहरों के वसनीक यायावर। भौतिक-गणित-रसायन शास्त्र त्रयी में बी.एससी.(इलाहाबाद), फिर साहित्य में पीएच. डी. (बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी)। अध्यापन: बिहार यूनिवर्सिटी (आरा), पंजाब यूनिवर्सिटी (चंडीगढ़), गुरुनानकदेव यूनिवर्सिटी (अमृतसर), यूनिवर्सिटी ऑफ आरकंसास पाइनब्लक (अमेरिका)। कार्ल मार्क्स के ध्यान-शिष्य, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अकिंचन शिष्य। सौन्दर्यबोध शास्त्र, देहभाषा, मिथक आलेखकार, समाजवैज्ञानिक वैश्विक दृष्टिकोण के विनायक- अनुगामी, आलोचिन्तक। इस ‘विश्वमिथकसरित्सागर’ नामक प्रथम हंसगान के सहवर्तन में ‘मानवदेह और हमारी देहभाषाएँ’ नामक दूसरा ग्रन्थ 2015 में ही प्रकाश्य। अथच अनन्त काल तथा विपुल पृथ्वी वाले भवभूति-सिन्ड्रोम के अनागत प्रीत और कीर्ति के आवरण झिलमिलाता हुआ...आहिस्ता...आहिस्ता...आहिस्ता! बस इतना ही: हुजश्र, प्रियवर, हमराही, सनम, जानमेन, हीरामन, नीलतारा... मेरे सलाम कुबूल करो!! स्थायी पता: फ्लैट सं.-3 (भू-तल), स्वास्तिक विहार, फेज-3 मनसादेवी काम्प्लेक्स, पंचकूला-134109 (हरियाणा) दूरभाष: 0172-2557312 मो.: 09780774244

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