SAAJHA SANSKRITI, SAMPRADAYIK AATANGVAAD AUR HINDI CINEMA

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-946-8

Author:JAWARIMAL PARAKH

Pages:272

MRP:Rs.450/-

Stock:In Stock

Rs.450/-

Details

हम जब किसी धार्मिक समुदाय की बात करते हैं, तो इस बात को भूल जाते हैं कि वह समुदाय एक आयामी नहीं होता । उसमें भी वे सभी भेद- विभेद होते हैं जो दूसरे धार्मिक समुदायों में होते हैं । एक अभिजात मुसलमान और एक गरीब मुसलमान का धर्म भले ही एक हो ,लेकिन उनके हित एक से नहीं होते । यदि ऐसा होता तो ('मुगले आज़म' फ़िल्म के सन्दर्भ में ) अकबर सलीम की शादी ख़ुशी-ख़ुशी अनारकली से कर देता,क्योंकि सलीम और अनारकली का धर्म तो एक ही था । दूसरा पहलू देखें तो यदि सलीम किसी राजपूत स्त्री से विवाह करना चाहता तो क्या अकबर एतराज़ करता ? नहीं , इतिहास हमें बताता है मुग़ल और राजपूत दोनों का धर्म अलग जरुर था,लेकिन दोनों का सम्बन्ध अभिजात वर्ग से था । यह विचार का विषय है कि 1947 से पहले और 1947 के बाद भी लगभग दो दशकों तक मुसलमान समुदाय पर जो भी फ़िल्में बनीं, वे प्राय: अभिजात वर्ग का प्रस्तुतीकरण करती थीं । इन फ़िल्मों की साथर्कता सिर्फ इतनी थी कि इनके माध्यम से सामंती पतनशीलता को मध्ययुगीन आदर्शवादिता से ढंकने की कोशिश जरुर दिखती थी । इन फ़िल्मों के माध्यम से मुसलमान की एक खास तरह की छवि निर्मित की गयी जो उन करोड़ों मुसलमान से मेल नहीं खाती थी,जो हिन्दुओं की तरह खेतों और कारखानों में काम करते थे , दफ्तरों में क्लर्की करते थे या स्कूलों -कॉलेजों में पढ़ते थे । जो न तो बड़ी -बड़ी हवेलियों में रहते थे , न खालिस उर्दू बोल पाते थे और न ही शेरो शायरी कर पाते थे । इन ढहते सामंती वर्ग के यथार्थ को पहली बार सही परिप्रेक्ष्य में ख्वाजा अहमद अब्बासी ने 'आसमान महल ' (1965) के माध्यम से पेश किया था । लेकिन इस फ़िल्म को जितना महत्त्व मिलना चाहिए था उतना नहीं मिल सका । इसके बाद ' गरम हवा ' (1973) ने बताया कि मुसलमान भी वैसे ही होते हैं जैसे हिन्दू । इसके बाद यह सिलसिला चल पड़ा । राजेंद्र सिंह बेदी ( दस्तक ),सईद अख्तर मिर्ज़ा ( सलीम लंगड़े पे मत रो, नसीम ), श्याम बेनेगल ( मम्मो ,हरी -भरी ), मनमोहन देसाई ( कुली ), शमित अमीन ( चक दे इंडिया ) और कबीर खान (न्यूयार्क ), करण जौहर ( माई नेम इज़ खान ) और कई अन्य फ़िल्मकारों ने उन आम मुसलमानों को अपना पात्र बनाया जिन्हें कहीं भी और कभी भी देखा जा सकता है ।

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About the writer

JAWARIMAL PARAKH

JAWARIMAL PARAKH जवरीमल्ल पारख का जन्म 1952 में जोधपुर , राजस्थान में हुआ था । इन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय से 1973 में बी.ए. आनर्स और 1975 में एम.ए . हिंदी प्रथम श्रेणी से उतीर्ण करने के बाद , प्रोफेसर नामवर सिंह के निर्देशन में 'नयी कविता का अंत:संघर्ष' विषय पर पीएच.डी.की उपाधि सन 1984, में जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय नयी दिल्ली से प्राप्त की । 1975 से 1987 तक रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय में व्याख्याता रहे ,1987 से 1989 तक इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय नयी दिल्ली में व्याख्याता रहे । 1989 से 1998 तक रीडर और 1998 से प्रोफेसर , 2004 से 2007 तक मानविकी विद्यापीठ के निर्देशक पद पर कार्य किया ।

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