MANDI MAIN MEDIA

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-216-6

Author:VINEET KUMAR

Pages:384

MRP:Rs.595/-

Stock:In Stock

Rs.595/-

Details

लोकतंत्र के इस नए बसंत में अन्ना,आमजन, अंबानी और अर्णब की आवाजें एक-दूसरे से गड्डमड्ड हो गई लगती हैं। 'मीडिया बिकाऊ है' के चौतरफा शोर के बीच और जस्टिस काटजू की खुलेआम आलोचना के बाद आत्म-नियंत्रण और नैतिकता की चादर छोटी पड़ने लगी है। ये नज़ारा कितना नया है, ये समझने के लिए दूरदर्शन व आकाशवाणी के सरकारी गिरेबान में झाँक लेना भी जरुरी लगता है। चित्रहार के गाने और फीचर फ़िल्में बैकडोर की लेन-देन से तय होती रहीं। स्क्रीन की पहचान भले ही 'रूकावट के लिए खेद है' से रही हो पर ऑफिस की मशहूर लाइन तो यही थी- आपका काम हो जायेगा बशर्ते....। सड़क पर रैलियों की भीड़ घटाने के लिए फ़िल्म 'बाबी' का ऐन वक्त पर चलाया जाना दूरदर्शन का खुला सच रहा है । इन सबके बाबजूद पब्लिक ब्राडकास्टिंग आलोचना के दायरे में नहीं है तो इसके पीछे क्या करण हैं, यह किताब इस पर विस्तार से चर्चा करती है । इतिहास के छोटे-से सफर के बाद बाकी किताब वर्तमान की गहमा-गहमी और उठा-पटक पर केन्द्रित है।निजी मीडिया ने इस पब्लिक ब्राडकास्टिंग की बुनियाद को कैसे एक लान्च-पैड की तरह इस्तेमाल किया और खुद एक ब्रांड बन जाने के बाद इसकी जड़ें काटनी शुरू कर दीं, यह सब जानना अपने आप में दिलचस्प है। "हमें सरकार से कोई लेना-देना नहीं" जैसे दावे के साथ अपनी यात्रा शुरू करनेवाला निजी मीडिया आगे चलकर कॉर्पोरेट घरानों की गोद में यूँ गिरा कि नीरा राडिया जैसी लॉबीइस्ट की लताड़ ही उसका बिज़नेस पैटर्न बन गया। सवाल है कि किसी ज़माने में पत्रकारिता को मिशन मानने वाला पत्रकार आज कहाँ खड़ा है - मूल्यों के साथ या बैलेंस-शीट के पीछे ? जब मीडिया के बड़े-बड़े जुर्म एथिक्स के पर्दे से ढँक दिए जाते हों तब यह सवाल उठना लाजिमी भी है कि राडिया-मीडिया प्रकरण और उसकी परिणति के बाद लौटे 'सामान्य दिन' क्या वाकई सामान्य हैं, या हम मीडिया, सत्ता, और कॉर्पोरेट पूँजी की गाढ़ी जुगलबंदी के दौर में अनिवार्य तौर पर प्रवेश कर चुके हैं, जहाँ केबल ऑपरेटर उतना ही बड़ा खलनायक है, जितना हम प्रायोजकों को मानते आये हैं।

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About the writer

VINEET KUMAR

VINEET KUMAR टीवी का कट्टर दर्शक। संवेदना और सरोकार की दुनिया में करियर बनाने की नीयत से मीडिया और साहित्य की मिली-जुली पढ़ाई। इस दौरान बेरोजगारी की मार से बचने के लिए अनुवाद का खुदरा काम। जमाने से कुछ हटके करने की चाहत में हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय से एफ एम चैनलों की भाषा पर एम. फिल. (2005)। ‘आजतक’ से मीडिया का ककहरा सीखने के बाद ‘जनमत न्यूज’ में पहली नौकरी। सीएसडीएस-सराय की स्टूडेंट फेलोशिप (2007) से निजी समाचार चैनलों की भाषा पर रिसर्च। यूजीसी-जेआरएफ की सफलता के बाद अकादमिक दुनिया में वापसी। लिखने का चस्का गाहे बगाहे और मोहल्ला ब्लॉग से। अपने ठिकाने ‘हुंकार’ के जरिए न्यू मीडिया, रेडियो और टीवी को एक कल्चरल टेक्स्ट के रूप में देखने-समझने की कोशिश। मीडिया और हिन्दी पब्लिक स्फीयर के बदलते मिजाज पर पिछले पांच सालों से लगातार टिप्पणी। मोहल्लालाइव, मीडियाख़बर, जनसत्ता के लिए नियमित लेखन। टीवी की दुनिया पर तहलका में ‘टेलीस्कोप’ नाम से कॉलम। फिलहालः दिल्ली विश्वविद्यालय से ‘मनोरंजन प्रधान चैनलों की भाषा एवं सांस्कृतिक निर्मितियां’ पर रिसर्च।

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