Ghareeb-E-Shaher

Format:Hard Bound

ISBN:81-7055-771-2

Author:RAHEE MASOOM RAZA

Pages:110

MRP:Rs.125/-

Stock:In Stock

Rs.125/-

Details

इन कविताओं में नया रंग और नयी समस्याएँ हैं। नया यथार्थबोध भी है। सामाजिक-राजनीतिक सवाल भी हैं। ‘ग़रीबे-षहर’ में राही की चिन्ताएँ बहुत व्यापक हैं। व्यक्ति, समाज, देष सभी कुछ इन कविताओं में है। राही महानगरों के कृत्रिम जीवन, आत्मकेन्द्रित इंसान और व्यक्तिवादी संस्कृति से दुःखी हैं। राही की कथनी और करनी में जीवन और लेखन में भेद नहीं था। इस दृष्टि से वे कबीर, प्रेमचन्द की परम्परा में आते हैं। अपनी बात जोखिम उठाकर कहते रहे, गद्य में भी। राही के लिए अपने ख़्वाब और वफ़ा सबसे महत्त्वपूर्ण है। वे साधारणजन के साथ विश्वासघात करना सबसे बड़ा दुष्कर्म मानते थे। आज सत्ता के पीछे पागल हो रहे हैं, वास्तविक प्रश्नों को धूमिल करके भ्रम और वाग्जाल के संसार का सृजन कर रहे हैं लेकिन राही ने इन परिस्थितियों से न कभी समझौता किया और न हार मानी।

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