Sangeet Chintan

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-269-8

Author:RAVINDRA NATH TAGORE

Pages:272

MRP:Rs.495/-

Stock:In Stock

Rs.495/-

Details

किस-किस रागिनी में कौन-कौन से स्वर लगते हैं या नहीं लगते हैं यह तो अति प्राचीन काल से स्थिर कर दिया गया है, उसे लेकर अधिक श्रम की जरूरत नहीं, अब तो संगीतवेत्ता यदि इस बात का पता लगाने का प्रयास करें कि किस-किस रागिनी में कौन-कौन से भाव हैं तो अधिक अच्छा हो। हमारे देश में संगीत इतना शास्त्रगत, अनुष्ठानगत हो गया है कि स्वाभाविकता से दूर हो गया है। ऐसा समय भी आएगा जब हमारे संगीत के परिचय के लिए हमें यूरोप जाना पड़ेगा। हमारे मत से राग-रागिनी विश्वसृष्टि में नित्य हैं, इसीलिए हमारे शास्त्रीय गान ठीक जैसे मानव का गान नहीं, वह जैसे समस्त जगत का गान है। भैरव जैसे भोर के आकाश का प्रथम जागरण है, परज जैसे अवसन्न रात्रिशेष की निद्राविह्वलता है, कान्हड़ा जैसे घनान्धकार में अभिसारिका निशीथिनी की पथविस्मृति है।

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RAVINDRA NATH TAGORE

RAVINDRA NATH TAGORE रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को कलकत्ता के प्रसिद्ध जोर सांको भवन में हुआ था। आपके पिता देबेन्‍द्रनाथ टैगोर (देवेन्द्रनाथ ठाकुर) ब्रह्म समाज के नेता थे। आप उनके सबसे छोटे पुत्र थे। आपका परिवार कोलकत्ता के प्रसिद्ध व समृद्ध परिवारों में से एक था। भारत का राष्ट्र-गान आप ही की देन है। रवीन्द्रनाथ टैगोर की बाल्यकाल से कविताएं और कहानियाँ लिखने में रुचि थी। रवीन्द्रनाथ टैगोर को प्रकृति से अगाध प्रेम था। एक बांग्ला कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार और चित्रकार थे। भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ रूप से पश्चिमी देशों का परिचय और पश्चिमी देशों की संस्कृति से भारत का परिचय कराने में टैगोर की बड़ी भूमिका रही तथा आमतौर पर उन्हें आधुनिक भारत का असाधारण सृजनशील कलाकार माना जाता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर की शिक्षा रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्राथमिक शिक्षा सेंट ज़ेवियर स्कूल में हुई। उनके पिता देवेन्द्रनाथ ठाकुर एक जाने-माने समाज सुधारक थे। वे चाहते थे कि रवीन्द्रनाथ बडे होकर बैरिस्टर बनें। इसलिए उन्होंने रवीन्द्रनाथ को क़ानून की पढ़ाई के लिए 1878 में लंदन भेजा लेकिन रवीन्द्रनाथ का मन तो साहित्य में था फिर मन वहाँ कैसे लगता! आपने कुछ समय तक लंदन के कॉलेज विश्वविद्यालय में क़ानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री लिए वापस आ गए। रवीन्द्रनाथ टैगोर का साहित्य सृजन साहित्य के विभिन्न विधाओं में सृजन किया। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की सबसे लोकप्रिय रचना 'गीतांजलि' रही जिसके लिए 1913 में उन्हें नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। आप विश्व के एकमात्र ऐसे साहित्यकार हैं जिनकी दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं। भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांग्ला' गुरुदेव की ही रचनाएं हैं। गीतांजलि लोगों को इतनी पसंद आई कि अंग्रेज़ी, जर्मन, फ्रैंच, जापानी, रूसी आदि विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया। टैगोर का नाम दुनिया के कोने-कोने में फैल गया और वे विश्व-मंच पर स्थापित हो गए। रवीन्द्रनाथ की कहानियों में क़ाबुलीवाला, मास्टर साहब और पोस्टमास्टर आज भी लोकप्रिय कहानियां हैं। रवीन्द्रनाथ की रचनाओं में स्वतंत्रता आंदोलन और उस समय के समाज की झलक स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। सामाजिक जीवन 16 अक्तूबर 1905 को रवीन्द्रनाथ के नेतृत्व में कोलकाता में मनाया गया रक्षाबंधन उत्सव से 'बंग-भंग आंदोलन' का आरम्भ हुआ। इसी आंदोलन ने भारत में स्वदेशी आंदोलन का सूत्रपात किया। टैगोर ने विश्व के सबसे बड़े नरसंहारों में से एक जलियांवाला कांड (1919) की घोर निंदा की और इसके विरोध में उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन द्वारा प्रदान की गई, 'नाइट हुड' की उपाधि लौटा दी। 'नाइट हुड' मिलने पर नाम के साथ 'सर' लगाया जाता है। निधन 7 अगस्त, 1941 को कलकत्ता में इस बहुमुखी साहित्यकार का निधन हो गया।

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