Kisan, Rashtriya Aandolan Aur Premchand : 1918-22

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-8143-867-6

Author:VEER BHARAT TALWAR

Pages:304

MRP:Rs.400/-

Stock:In Stock

Rs.400/-

Details

यों तो हिन्दी में साहित्य के समाजशास्त्र की चर्चा चल पड़ी है और पश्चिमी लेखकों के कृतित्व का सामान्य परिचय देते हुए कुछ किताबें भी सामने आ गयी हैं। पर सच पूछिये तो डॉ. वीर भारत तलवार की यह किताब हिन्दी में साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन की सबसे पहली, मुकम्मल तथा ढंग की पुस्तक है। यह किताब साहित्य के समाजशास्त्र के बारे में नहीं बल्कि स्वयं साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन की है। लेकिन इस पुस्तक के बारे में सिर्फ इतना ही कहना काफी नहीं होगा। वास्तव में यह किताब जितनी साहित्य के समाजशास्त्रीय की है, उतनी ही शोधपरक साहित्यिक आलोचना की भी है। चूँकि यह साहित्यिक आलोचना समाजशास्त्र, इतिहास, खेतिहर अर्थशास्त्र तथा राजनीति की परस्पर अन्तः सम्बन्धित पृष्ठभूमि पर आधारित है, इसलिए यह हिन्दी की साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में भी एक नयी अन्तर्दृष्टि देती है और आलोचना की एक नयी पद्धति पेश करती है।

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VEER BHARAT TALWAR

VEER BHARAT TALWAR वीरभारत तलवार : 20 सितम्बर, 1947 को जमशेदपुर में लोहे के कारखाने में काम करने वाले एक शिक्षित मजदूर परिवार में जन्म। 1970 में हिन्दी एम.ए. बनारस हिन्दू वि.वि. से। 1984 में पीएच.डी. जे.एन.यू. से। 1970 का पूरा दशक नक्सलवादी आन्दोलन में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में धनबाद के कोयला खदान मजदूरों के बीच और फिर राँची-सिंहभूम के आदिवासियों के बीच काम किया। अलग झारखंड राज्य आन्दोलन के प्रमुख सिद्धान्तकार बने। इसी दौर में तीन राजनीतिक पत्रिकाओं का प्रकाशन-सम्पादन किया-फिलहाल (1972-74) पटना से, शालपत्र (1977-78) धनबाद से और झारखंड वार्ता (1977-78) राँची से। झारखंड : क्यूँ और कैसे? तथा झारखंड के आदिवासी और आर.एस.एस. नाम से दो लोकप्रिय राजनीतिक पैंफलेट लिखे। आदिवासी इलाकों में बड़े बाँधों के विकल्प पर शोध किया और राँची विश्वविद्यालय में आदिवासी भाषाओं के विभाग खुलवाने का आन्दोलन किया। 1988-89 में झारखंड के आदिवासियों द्वारा दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान भगवान विरसा पुरस्कार से सम्मानित किए गए। किताबें : किसान, राष्ट्रीय आन्दोलन और प्रेमचन्द : 1918-22, राष्ट्रीय नवजागरण और साहित्य : कुछ प्रसंग, कुछ प्रवृत्तियाँ, हिन्दू नवजागरण की विचारधारा : सत्यार्थप्रकाश : समालोचना का एक प्रयास। 1996 से 1999 तक भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, में फेलो। फिलहाल जे.एन.यू के भारतीय भाषा केन्द्र में एसोसिएट प्रोफ़ेसर।

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