SHAMSHER KA SANSAR

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-563-4

Author:RAMAN SINHA

Pages:196

MRP:Rs.375/-

Stock:In Stock

Rs.375/-

Details

शमशेर कवि हैं, गद्यकार हैं, अनुवादक भी हैं और चित्रकार भी, फिर भी वे अपने किसी माध्यम से सन्तुष्ट नहीं; अपनी एक कविता में वे कहते हैं: ”ओ माध्यम! /क्षमा करना/कि मैं तुम्हारे पार जाना चाहता रहा हूँ।“ माध्यम के पार जाने की यह आकांक्षा क्या कला-रूपों की संरचनात्मक असमर्थताओं के बोध से उत्पन्न हुई है या यह रचनाकार के विशिष्ट अवबोध (पर्सेप्सन) का परिणाम है? शमशेर के यहाँ प्रेम और सौन्दर्य का अद्वैत है उसी प्रकार मानव-प्रेम और प्रकृति-प्रेम में भी कोई भेद नहीं किया गया है; क्या उनकी सामाजिक चेतना ऐसी है कि सामाजिकता के अनिवार्यतः विरोधी के रूप में आत्मनिष्ठता की रूढ़ छवि का भी वे प्रत्याख्यान करते जान पड़ते हैं? शिल्प के क्षेत्र में भी जिस टूटी हुई बिखरी हुई शैली का वे अन्वेषण करते हैं, क्या वह रचना की आन्तरिक जरूरतों की वजह से उत्पन्न हुआ है या यह महज प्रयोग के लिए प्रयोग का परिणाम है? शमशेर एक अनोखे गद्यकार भी हैं और उन्होंने गद्य की प्रायः सभी विधाओं में लिखा है - इसके अतिरिक्त उन्होंने गद्य में उर्दू-अंग्रेजी की कुछ कृतियों का अनुवाद भी किया है। शमशेर के साहित्यिक जीवन की शुरुआत अनुवाद की पुस्तक से हुई थी जो अनुवादक के विचारधारात्मक आग्रहों के अलावे एक अनूठे गद्यकार के शिल्प-निर्माण की कथा भी सामने ले आ सकते हैं ? शमशेर का चित्र-कला से सम्बन्ध शौकिया न होकर पेशेवर किस्म का रहा है इसलिए इनके बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि ये मूलतः कवि हैं जिन्होंने कुछ चित्र भी बनाये और न इनके चित्रों को इनकी कविता का क्षेपक मानते हुए काव्यनुमा प्रतिमानों से इसकी व्याख्या या मूल्यांकन सम्भव है। यहाँ शमशेर के चित्रों को तत्कालीन कला-परिदृश्य के एक अविभाज्य अंग के रूप में देखते हुए उसकी अर्थवत्ता व मूल्यवत्ता निर्धारित करने का प्रयत्न किया गया है।

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About the writer

RAMAN SINHA

RAMAN SINHA रमण सिन्हा (1960) भारतीय भाषा केन्द्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली में हिन्दी पढ़ाते हैं। इनकी दो पुस्तकें - ‘अनुवाद और रचना का उत्तर-जीवन’ तथा ‘रामचरितमानस: पाठ: लीला: चित्र: संगीत’ प्रकाशित हो चुकी हैं। चित्र, संगीत, साहित्य, अनुवाद पर लेख एवं कविताएँ, हिन्दी-अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं व सम्पादित पुस्तकों में छिटपुट प्रकाशित होते रहे हैं। इन दिनों ‘रामचरितमानस: एक रचना का विमर्श’ पुस्तक को अन्तिम रूप देने में व्यस्त हैं।

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