SANNIDHYA-SAHITYKAR

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-567-2

Author:GOVIND MISHRA

Pages:118

MRP:Rs.200/-

Stock:In Stock

Rs.200/-

Details

उस ज़माने में जब लेखकों के आपसी सम्बन्ध उतने मधुर न रहे हों, पूर्ववर्ती साहित्यकारों की छवि को ध्वस्त करना स्वयं को स्थापित करने की अनिवार्यता सी बनी दीखती हो, प्रयोगधर्मिता और आधुनिकता का अर्थ अपनी परम्परा को रौंदना हो गया हो, परम्परा को पुरातनपन्थ का पर्याय माना जाता हो...तब गोविन्द मिश्र का यह संकलन आश्चर्य की बात है। वे अग्रजों के भाव से अपने पूर्ववर्ती साहित्यकारों का स्मरण करते हैं...लेकिन वहीं ठहरकर नहीं रह जाते। साहित्यकार कभी दिवंगत नहीं होते...इस विचार से वे अग्रजों के साथ-साथ अपने हमउम्रों को भी उठाते हैं। उन्हें भी जो भले ही ऊँचे पायदान के लेखक न रहे हों पर आदमीयत के स्तर पर विलक्षण थे। यहाँ श्रद्धाधर्म के आलोक में आलोचनाकर्म भी है जिसमें इन साहित्यकारों अग्रजों के साहित्य का मर्म भी उजागर होता है। और यह सब व्यक्तिगत सान्निध्य, सम्बन्ध की ऊष्मा से निसृत है जिससे उन साहित्यकारों का आकलन बेहद ईमानदार और प्रामाणिक बन गया है। हिन्दी साहित्य के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों जैसे - जैनेन्द्र, अज्ञेय, नरेन्द्र शर्मा, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, शैलेश मटियानी, भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा, श्रीलाल शुक्ल आदि के साथ गोविन्द मिश्र के व्यक्तिगत और मधुर सम्बन्ध रहे हैं; उनके आधार पर बनायी गयीं हमारे इन साहित्यकारों की तस्वीरें हिन्दी साहित्य की नयी पीढ़ी के लिए गोविन्द मिश्र की अनुपम भेंट कही जाएगी।

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GOVIND MISHRA

GOVIND MISHRA 1965 से लगातार और उत्तरोत्तर स्तरीय लेखन के लिए सुविख्यात गोविन्द मिश्र इसका श्रेय अपने खुलेपन को देते हैं; समकालीन कथा-साहित्य में उनकी अपनी अलग पहचान है - एक ऐसी उपस्थिति जो एक सम्पूर्ण साहित्यकार का बोध कराती है, जिसकी वरीयताओं में लेखन सर्वोपरि है, जिसकी चिन्ताएँ समकालीन समाज से उठकर ‘पृथ्वी पर मनुष्य’ के रहने के सन्दर्भ तक जाती हैं और जिसका लेखक-फलक ‘लाल पीली ज़मीन’ के खुरदरे यथार्थ, ‘तुम्हारी रोशनी में’ की कोमलता और काव्यात्मकता, ‘धीरसमीरे’ की भारतीय परम्परा की खोज, ‘हुजूर दरबार’ और ‘पाँच आँगनों वाला घर’ की इतिहास और अतीत के सन्दर्भ में आज के प्रश्नों की पड़ताल - इन्हें एक साथ समेटे हुए है। कम साहित्यकार होंगे जिनका इतना बड़ा ‘रेंज’ होगा और जिनके सृजित पात्रों की संख्या ही हजार से ऊपर पहुँच रही होगी, जिनकी कहानियों में एक तरफ ‘कचकौंध’ के गँवई गाँव के मास्टर साहब हैं तो ‘मायकल लोबो’ जैसा आधुनिक पात्र या ‘खाक इतिहास’ की विदेशी मारिया भी। गोविन्द मिश्र बुन्देलखण्ड के हैं तो बुन्देली उनका भाषायी आधार है, लेकिन वे उतनी ही आसानी से ‘धीरसमीरे’ में ब्रजभाषा और ‘पाँच आँगनों वाला घर’ और ‘पगला बाबा’ में बनारसी-भोजपुरी में भी सरक जाते हैं। उपन्यास-कहानियों के अलावा उनके यात्रावृत्त, निबन्ध, बालसाहित्य और कविताओं के संग्रह भी हैं। प्राप्त कई पुरस्कारों/सम्मानों में ‘पाँच आँगनों वाला घर’ के लिए 1998 का व्यास सम्मान, राष्ट्रपतिजी द्वारा दिया गया सुब्रमण्य भारती सम्मान और 2008 का साहित्य अकादेमी सम्मान विशेष उल्लेखनीय हैं। इनकी प्रकाशित रचनाएँ हैं - वह/अपना चेहरा, उतरती हुई धूप, लाल पीली ज़मीन, हुजूर दरबार, तुम्हारी रोशनी में, धीरसमीरे, पाँच आँगनों वाला घर, फूल...इमारतें और बन्दर, कोहरे में कैद रंग, धूल पौधों पर (उपन्यास); दस से ऊपर, अन्तिम चार - पगला बाबा, आसमान...कितना नीला, हवाबाज, मुझे बाहर निकालो (कहानी संग्रह); निर्झरिणी (सम्पूर्ण कहानियाँ दो खण्डों में); धुन्ध-भरी सुर्खी, दरख्तों के पार...शाम, झूलती जड़ें, परतों के बीच, और यात्राएँ (यात्रावृत्त); रंगों की गन्ध (सम्पूर्ण यात्रावृत्त दो खण्डों में); साहित्य का सन्दर्भ, कथा भूमि, संवाद अनायास, समय और सर्जना (निबन्ध); ओ प्रकृति माँ (कविता); मास्टर मनसुखराम, कवि के घर में चोर, आदमी का जानवर (बाल साहित्य)।

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