PANDRAH PANCH PACHHATTAR

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5000-290-2

Author:GULZAR

Pages:144

MRP:Rs.325/-

Stock:Out of Stock

Rs.325/-

Details

‘पन्द्रह पाँच पचहत्तर' की कविताएँ पंद्रह खंडों में विभाजित हैं और हर खंड में पाँच कविताएँ हैं। गुलज़ार का यह पहला संग्रह है, जिसमें मानवीयकरण का इतना व्यापक प्रयोग किया गया है। यहाँ हर चीज बोलती है-आसमान की कनपट्टियाँ पकने लगती हैं, काल माई खुदा को नीले रंग के, गोल-से इक सय्यारे पर छोड़ देती है, धूप का टुकड़ा लॉन में सहमे हुए एक परिंदे की तरह बैठ जाता है...यहाँ तक कि मुझे मेरा जिस्म छोड़ कर बह गया नदी में। यह कोई उक्ति-वैचित्र्य नहीं, बल्कि वास्तविकता का बयान करने की एक नई, आत्मीय शैली है। यह वास्तविकता भी कुछ नई-नई-सी है, जिसकी हर परत से एक कोमल उदासी बाविस्ता है। यह उदासी जहाँ हमारे युगबोध को एक तीखी धार देती है, वहीं उसकी कोमलता की लय ज़िन्दगी को जीने लायक बनाती है। कुल मिला कर, पचहत्तर नज़्मों में बिखरा हुआ यह महाकाव्य हमारी अपनी ज़िन्दगी और हमारे अपने परिवेश की एक ऐसी इंस्पेक्शन रिपोर्ट है जिसका मजमून गुलज़ार जैसा संवेदनशील और खानाबदोश शायर ही कलमबंद कर सकता था।

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About the writer

GULZAR

GULZAR असाधारण और बहुआयामी प्रतिभा के धनी गुलज़ार श्रेष्ठता और लोकप्रियता, दोनों ही कसौटियों पर सफल एक ऐसे फनकार हैं जो विभिन्न कला माध्यमों में काम करने के साथ-साथ अभिव्यक्ति के अपने माध्यम की खोज भी करते रहे हैं। वे एक मशहूर शायर, अप्रतिम फिल्मकार, संजीदा कहानी लेखक एवं बेहतरीन गीतकार हैं। साथ ही, वे एक मँजे हुए संवाद और पटकथा लेखक भी हैं। 18 अगस्त 1934 को झेलम जिले (अब पाकिस्तान में) के दीना गाँव में जन्मे गुलज़ार ने विमल रॉय और हृषीकेश मुखर्जी की छाया में अपना फिल्मी सफर शुरू किया। गीतकार के रूप में उन्होंने सचिनदेव बर्मन के लिए बंदिनी के लिए पहली बार गीत लिखे। गुलज़ार ने खुशबू, आँधी (आपातकाल के दौरान प्रतिबंधित), लिबास, मौसम, मीरा, परिचय, अंगूर, माचिस और हू तू तू जैसी मौलिक फिल्मों के निर्देशन के अलावा मिर्ज़ा ग़ालिब पर एक उत्कृष्ट टीवी सीरियल भी बनाया है। गुलज़ार की कविताएँ जानम, एक बूँद चाँद, कुछ और नज़्में साइलेंसेज़, पुखराज, ऑटम मून, त्रिवेणी, रात, चाँद और मैं, रात पश्मीने की, यार जुलाहे तथा पन्द्रह पाँच पचहत्तर में संकलित हैं। कहानियों के महत्त्वपूर्ण संग्रह हैं चौरस रात, धुआँ, जीना यहाँ और ड्योढ़ी (हिन्दी और उर्दू)। रावी पार में गुलज़ार ने विमल रॉय के संस्मरण लिखे हैं। उन्होंने बच्चों के लिए कुछ बेहद अच्छी रचनाएँ भी की हैं। पद्म भूषण, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, ग्रेमी पुरस्कार, ऑस्कर अवार्ड तथा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज, शिमला के प्रतिष्ठित लाइफ टाइम अचीवमेंट फेलोशिप सहित दर्जनों अलंकरणों से सम्मानित गुलज़ार को बीस बार फिल्मफेयर पुरस्कार एवं सात बार नेशनल अवार्ड मिल चुका है। वे मुम्बई में रहते हैं और फिल्मों के लिए गीत, संवाद एवं पटकथा लिखते हुए कुछ महत्त्वपूर्ण कवियों का अनुवाद कर रहे हैं।

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