KABIR : 'KHASAM KHUSHI KYON HOY?'

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-427-9

Author:DR. DHARAMVEER

Pages:362

MRP:Rs.750/-

Stock:In Stock

Rs.750/-

Details

‘कबीर के आलोचक’ समेत उपर्युक्त छह पुस्तकों और लम्बी बहस के बाद कबीर पर कोई नया और गम्भीर अध्ययन डॉ. धर्मवीर को नजरअन्दाज करके नहीं किया जा सकता है, भले ही उसमें डॉ. धर्मवीर की काट ही काट हो। अगर उस बहस में शामिल रहने वाला कोई विद्वान अपने कबीर सम्बन्धी अध्ययन में डॉ. धर्मवीर को नजरअन्दाज करता है तो अकादमिक जगत के लिए यह चिन्ता का बायस होना चाहिए। अकादमिक ईमानदारी का विकल्प नहीं है और उसका समुचित निर्वाह सभी विद्वानों की सम्मिलित जिम्मेदारी है। जब डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय’ का प्रकाशन-पूर्व प्रचार शुरू हुआ तो हमने स्वाभाविक तौर पर माना कि आलोचक ने डॉ. धर्मवीर की पुस्तकों और बहस को खाते में लेकर अपना अध्ययन प्रस्तुत किया होगा और इस रूप में वह कबीर पर एक महत्त्वपूर्ण आलोचना-कृति होगी। पुस्तक प्रकाशित होने पर हमें अपने एक शोधार्थी से यह जान कर आश्चर्य हुआ कि डॉ. अग्रवाल की पुस्तक में डॉ. धर्मवीर की पुस्तकों का कहीं जिक्र ही नहीं है। पाँच साल पहले जो महाभारत कबीर को लेकर मच चुका है, उसके बाद यह सम्भव नहीं है कि कबीर पर तीस-बत्तीस साल लगा कर काम करने वाले विद्वान के सामने डॉ. धर्मवीर के कबीर की तस्वीर न झूलती रहे। यह स्वीकृत मान्यता है कि भक्तिकालीन भक्त एवं सन्त कवियों ने अपनी-अपनी मनोभूमि से समवेत रूप में प्रेम को पाँचवाँ पुरुषार्थ सिद्ध कर दिया था। यह भी माना जा सकता है कि कबीर और रैदास की प्रेमोपासना सम्भवतः सबसे निराली और सबसे उदात्त है। ऐसे में कबीर समेत समस्त भक्तिकालीन रचनाकारों के प्रेमोपासक होने से भला किसे ऐतराज हो सकता है? डॉ. धर्मवीर ने कबीर की खोज मुक्त-ज्ञान के करुणानिधान के रूप में की है। वहाँ उनसे मुठभेड़ की जा सकती है, जो कुछ हद तक हुई भी, और धर्मवीर ने जवाब भी दिए। उनके जवाबों को अपर्याप्त, यहाँ तक कि गलत ठहराया जा सकता है। डॉ. अग्रवाल की पुस्तक के शीर्षक से ही यह समझा जा सकता है कि लेखक ने प्रेम की अकथ कहानी की आड़ में ज्ञान पर वर्चस्व की राजनीति की है। कबीर को डॉ. धर्मवीर से छुड़ा कर प्रेम के पुराने अखाड़े में खींच कर ले जाना दरअसल प्रतिक्रियावाद कहा जाएगा। दलित-चिन्तन की भूमि से इसे ब्रह्माणवादी साजिश भी कहा जा सकता है। हमने इस पुस्तक की राजनीति के बारे में बाहर से बताया है। बेहतर होगा कि डॉ. धर्मवीर तीन दशक का समय लगा कर लिखी गयी डॉ. अग्रवाल की बहुप्रशंसित पुस्तक को पढ़ें और उसकी अन्दरूनी राजनीति की विस्तृत समीक्षा करें।

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DR. DHARAMVEER

DR. DHARAMVEER महान आजीवक: कबीर, रैदास और गोसाल 2017 कबीर: ‘खसम खुशी क्यों होय?’ 2013 प्रेमचन्द की नीली आँखें 2010 मेरी पत्नी और भेड़िया 2009 दलित चिन्तन का विकास 2007 दूसरों की जूतियाँ 2007 तीन द्विज हिन्दू स्त्रीलिंगों का चिन्तन 2007 चमार की बेटी रूपा 2007 दलित सिविल कानून 2007 दलित आत्मालोचन की प्रक्रिया 2007 ‘जूठन’ का लेखक कौन है? 2006 थेरीगाथा की स्त्रियाँ और डॉ. अम्बेडकर 2005 कामसूत्र की सन्तानें 2005 प्रेमचन्द: सामन्त का मुंशी 2005 अशोक बनाम वाजपेयी: अशोक वाजपेयी 2004 डॉ. अम्बेडकर के प्रशासनिक विचार 2004 सीमन्तनी उपदेश (सम्पादित) 2004 कबीर: सूत न कपास 2003 कबीर के कुछ और आलोचक 2002 कबीर: डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का प्रक्षिप्त चिन्तन 2000 कबीर और रामानन्द: किंवदंतियाँ 2000 कबीर: बाज भी, कपोत भी, पपीहा भी 2000 कबीर के आलोचक 1997 सन्त रैदास का निर्वर्ण सम्प्रदाय (पुरस्कृत) 1990 हिन्दी की आत्मा 1989 लोकायती वैष्णव विष्णु प्रभाकर (पुरस्कृत) 1987

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