SANT SHIROMANI RAIDAS : VANI AUR VICHAR

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-402-6

Author:DR. PRANAV KUMAR BANERJEE

Pages:240

MRP:Rs.450/-

Stock:In Stock

Rs.450/-

Details

रैदास जन्म के कारणै, होत न कोई नीच। नर को नीच करि डारै है, ओछे करम की कीच ॥ सन्त शिरोमणि रैदास का जीवन और साहित्य एक ऐसा दीप स्तम्भ है जो लगभग छह शताब्दियों से दलित समाज का मार्ग दर्शन कर रहा है। सन्त रैदास के साहित्य पर अभी तक जितने भी विद्वानों ने काम किया है, उनका अपना एक निजी दृष्टिकोण रहा है, जो उन्हें एक हिन्दूवादी सन्त प्रमाणित करने में ही अपनी ऊर्जा खपाता रहा है। इस ग्रन्थ में सन्त रैदास के जीवन, काव्य और उपदेशों को 'दलित दृष्टिकोण' से प्रतिपादित किया गया है। जिसका निष्कर्ष है कि सन्त रैदास का जीवन और काव्य उदात्त मानवता के लिए सदाचारों के शाश्वत सैद्धान्तिक मूल्यों का अक्षय भण्डार है जिसमें से प्रत्येक वर्ग और स्थिति तथा मानसिक स्तर का व्यक्ति अपने लिए सुन्दर-सुन्दर मोतियों का चुनाव सुगमता से कर सकता है। उन्होंने हिन्दू-मुसलमानों में भावात्मक एकता स्थापित करने का प्रयास किया। छुआछूत तथा 'वर्ण व्यवस्था' का विरोध कर सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अचूक औषधि तैयार की। ‘जीवहत्या' को पाप घोषित कर मांसाहार जैसी प्रवृत्ति को समाप्त करने का प्रयास किया, जो प्रकारान्तर से अहिंसा का प्रचार ही है। वहीं उन्होंने मानवमरत्र को श्रम के प्रति अटूट आस्था का उपदेश दिया। इससे भी बडी बात जो उस युग के और किसी सन्त कवि में दिखाई नहीं देती, वह है उनकी 'स्वातन्त्र्य चेतना' । उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई थी और एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जहाँ पर ये सब विषमताएँ न हों ऐसा चाहौं राज मैं, जहाँ मिलै सबन को अन्न। छोट-बड़ौ सब सम बसैं, रैदास' रहैं प्रसन्न ॥

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About the writer

DR. N. SINGH

DR. N. SINGH जन्म: जनवरी,1956 जन्म स्थान :ग्राम चतरसाली ,जनपद सहारनपुर(उ.प्र) शिक्षा : एम.ए.(हिन्दी),पी.एच.डी 'आचार्य पदमसिंह शर्मा:व्यक्तीत्व एवं कृतित्व' विषय पर मेरठ विश्वविद्यालय मेरठ में सन 1980 में |

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