BATEN-MULAQATEN : AATMPARAK-SAHITYAPARAK

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-695-2

Author:MANOHAR SHYAM JOSHI

Pages:183

MRP:Rs.395/-

Stock:In Stock

Rs.395/-

Details

बातें-मुलाक़ातें : आत्मपरक-साहित्यपरक

Additional Information

मनोहर श्याम जोशी ने लिखा तो बहुत लेकिन अपने बारे में बहुत कम लिखा। वे आत्ममुग्धता के नहीं आत्मसंशय के लेखक थे। सब पर व्यंग्य करते थे उससे भी पहले ख़ुद पर व्यंग्य करते थे। इसीलिए इस पुस्तक का विशेष महत्त्व हो जाता है। पुस्तक में बातें हैं, मुलाक़ातें हैं और जोशी जी हैं। पहली बार यहाँ वे साक्षात्कार प्रकाशित हो रहे हैं जो समय-समय पर उन्होंने अनेक शोधार्थियों को दिये थे। निश्चय ही लेखक के व्यक्तित्व, उनके लेखन को समझने में इन साक्षात्कारों का विशेष महत्त्व है। हिन्दी में बड़ी तादाद में मौजूद उनके पाठकों के लिए भी और शोधार्थियों के लिए भी। यह भी जानना दिलचस्प है कि मनोहर श्याम जोशी ने रचनात्मक लेखन के अलावा अन्य साहित्यिक प्रसंगों पर कम ही लिखा, लेकिन जब लिखा तो ख़ूब लिखा। इस पुस्तक में ऐसे कई दुर्लभ लेख संकलित हैं जिनसे उनकी गम्भीर साहित्यिक दृष्टि का पता चलता है। हिन्दी उपन्यासों के सीमान्तों को खोल कर रख देने वाले इस उपन्यासकार का एक दुर्लभ लेख भी इस पुस्तक में है जो आधुनिकोत्तर उपन्यास की अवधारणा को लेकर है। मेरे जानते उत्तर-आधुनिकता को लेकर किसी बड़े रचनाकार का यह अकेला ही लेख है। अपने उपन्यासों को लेकर भी एक लेख है। बहुआयामी लेखक मनोहरश्याम जोशी का व्यक्तित्व विराट था जो पुस्तक के अनेक साक्षात्कारों में लघु-लघु खुलता है। किसी विधा में न रमने वाले इस लेखक ने हर विधा में जमकर लिखा। पुस्तक में संकलित साक्षात्कारों से उनके लेखक व्यक्तित्व का वह रूप उभर कर आता है जो हम पाठकों से अक्सर ओझल ही रहता आया है। इस नितान्त सार्वजनिक लेखक का निजी कोना जो जल्दी ही पाठकों को अन्तरंग बनाकर अपने से बाँध लेने वाला है। एक ऐसी पुस्तक जो जोशी जी के लेखन-जीवन, उनके सरोकारों को नयी रोशनी में देखने-समझने की माँग करती है। -प्रभात रंजन

About the writer

MANOHAR SHYAM JOSHI

MANOHAR SHYAM JOSHI मनोहर श्याम जोशी 9 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्रा जीवन से ही लेखक और पत्राकार बन गये। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आषीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21वें वर्श से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गये। प्रेस, रेडियो, टी.वी., वष्त्तचित्रा, फिल्म, विज्ञापन-सम्प्रेशण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विशय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया है। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्श के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्श के होने आये। केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतन्त्रा लेखन करते रहे । निधन: 30 मार्च 2006।

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