SANT VANI-1 : NALAYIRA DIVYA PRABANDHAM

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-201-8

Author:DR. P. JAYARAMAN

Pages:356

MRP:Rs.795/-

Stock:In Stock

Rs.795/-

Details

कर्म-ज्ञान-भक्ति योग से आप्लावित भारतवर्ष के दक्षिण से उत्तर तथा पूर्व से पश्चिम तक उसकी भावात्मक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक एकात्मता उसकी सुदीर्घ वैचारिक धारा से स्वयंसिद्ध है। भारतीय एकात्म संस्कृति का निर्माण आध्यात्मिक चेतना की आधार-शिला पर हुआ है। इस तथ्य के अनेकानेक प्रमाण हैं। उनमें से एक है युगों से चली आनेवाली वैष्णव भक्ति-धारा। भारतीय निगमों, आगमों, भगवद्गीता पद्म पुराण, विष्णु पुराण, श्रीमद् भागवत आदि के द्वारा जो वैष्णव भक्ति चेतना उत्तर भारत में विकसित हुई वही ईसा पूर्व के संघकालीन तमिल साहित्य से होते हुए संघोत्तरकालीन महाकाव्य ‘शिलप्पधिकारम्’, ‘मणिमेखलै’ आदि में प्रतिष्ठित होकर परवर्ती परम भागवत वैष्णव संत भक्तों-आषवारों के ‘दिव्य प्रबन्धम्’ में आकर गहनतम प्रपत्तिपरक नारायण (विष्णु) भक्ति के रूप में व्यापक रूप से प्रचारित हुई। यह वैष्णव भक्ति-धारा परवर्ती आचार्यों के माध्यम से दक्षिण से वृन्दावन तक पहुँचकर समग्र भारत में परिव्याप्त हुई। यह भारत की आध्यात्मिक एकात्मता की संक्षिप्त रूपरेखा है। आज के भारत का राष्ट्रीय परिवेश भौतिक श्रीवृद्धि का प्रतिमान है। साथ ही वह नानाविघ बाह्यविभेद रेखाओं से विभिन्न भागों में बँटा हुआ भी है। किन्तु भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक एकात्म चेतना आज भी अक्षुण्ण है और हिमाचल से कन्याकुमारी तक की उसकी एकसूत्रता शाश्वत है। इस राष्ट्रीय आध्यात्मिक एकात्मता का प्रतिपादन ही इस ग्रंथ का मूल मंत्र है।

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DR. P. JAYARAMAN

DR. P. JAYARAMAN संस्कृत, हिन्दी एवं तमिल साहित्य के विद्वान; भारतीय संस्कृति तथा साहित्य की एकात्मता के प्रति समर्पित अठारह वर्ष तक अध्ययन कार्य में रत; बैं¯कग क्षेत्र में जन-सामान्य के हित के लिए भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु भारतीय रिज़र्व बैंक के प्रबंध तंत्र में सोलह वर्ष तक कार्यरत; 1980 में न्यू यार्क में भारतीय विद्या भवन की स्थापना कर विगत उनतीस वर्षों से अमेरिका में भारतीय संस्कृति, परम्परा, दर्शन, भाषा, साहित्य एवं कलाओं के प्रचार-प्रसार में संलग्न। शैक्षणिक योग्यता - एम.ए. (संस्कृत तथा हिन्दी); पीएच.डी., डी.लिट्. प्रमुख प्रकाशन – 1.कवि सुब्रमणिय भारती तथा सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के काव्य का तुलनात्मक अध्ययन (पीएच.डी. का शोध प्रबन्ध)। 2.कवि श्री भारती (सुब्रमणिय भारती की चुनी हुई कविताओं का हिन्दी रूपान्तर)। 3.पुरनानूरु (प्राचीन तमिल काव्य) की कथाएँ। 4.स्व. अखिलन के तमिल उपन्यास ‘चित्तिरप्पावै’ का हिन्दी रूपान्तर ‘चित्रित प्रतिमा’ के नाम से (नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित)। 5.तमिल-हिन्दी स्वयं शिक्षक (के. हि. निदेशालय का प्रकाशन)। 6.चिन्मय काव्य (योगी श्री चिन्मय की चुनी हुई अंग्रेज़ी कविताओं का हिन्दी पद्य रूपान्तर)। 7.जैन धर्म, स्वामी विवेकानन्द तथा आधुनिक भारत के निर्माताओं पर अंग्रेज़ी में संपादित ग्रंथ। 8.शिलम्बु (तमिल नाटक - प्राचीन तमिल काव्य शिलप्पधिकारम् पर आधारित) 9.भक्ति के आयाम; वाणी प्रकाशन। सम्मान - साहित्य वाचस्पति (हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग); साहित्य भूषण (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान); हिन्दी भाषा एवं साहित्य की सेवा के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा द्वारा प्रदत्त सम्मान (2006); प्रवासी भारतीय सम्मान, भारत सरकार द्वारा प्रदत्त 2007; पद्मश्री, भारत सरकार द्वारा प्रदत्त (2009)। अन्य सेवायें: आकाशवाणी, मद्रास एवं बंबई में वार्ताकार तथा दूरदर्शन, बंबई में ‘संचयिता’ के नाम से पाक्षिक पत्रिका-कार्यक्रमों के प्रस्तोता (सन 1980 तक)

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