KAANCH KE AANSOO

Original Book/Language: ‘डेर मेन्श डस्ट आडन ग्रोस्सर फ़सान आउफ डेर वेल्ट’ एक रोमानियाई मुहावरे का जर्मन अनुवाद है, जिसका अर्थ है कि इंसान इस दुनिया में एक बड़े तीतर की तरह लाचार है, यह हेर्टा म्युलर का पहला वृत्तान्त है जिसका विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है, मसलन अंग्रेजी में ‘पासपोर्ट’ के नाम से। हिन्दी में भी सबसे पहले ‘काँच के आँसू’ को ही मूल जर्मन से अनूदित किया गया है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद के शान्ति समझौतों में ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य का बनात नामक प्रदेश तीन देशों में बाँट दिया गया था - यूगोस्लाविया, हंगरी और रोमानिया। ‘काँच के आँसू’ रोमानिया के बनात प्रान्त में रहने वाले एक जर्मन-भाषी गाँव की कहानी है, जो अपने में लिप्त दुनिया में जीता है और जिसके लिए सब कुछ जर्मन ही महत्त्वपूर्ण है और रोमानियाई चीजें और लोग तुच्छ हैं; यह रवैया रोजमर्रा के व्यवहार में भी झलकता है जैसे रोमानियावासियों को वलाक़ी बुलाना और उन्हें हेय दृष्टि से देखना या फिर पात्रों का कहना कि रोमानियावासियों की कब्रें भी जर्मनों की कब्रों से अलग महकती हैं या कि बनात का मौसम ऑस्ट्रिया से आता है, न कि बुखारेस्ट से। इनके लिए इतिहास में दरिन्दगी का पर्याय बनी नात्सी काल की एस. एस. सेना भी गौरव की सूचक है। इसमें पासपोर्ट के लिए एक चक्की वाले विंडिश की अथक कोशिशों का विवरण है। यह कहानी शुरू होती है इस वाक्य से - जब से विंडिश विदेश में बसना चाह रहा है, उसे गाँव में हर तरफ अन्तर नजर आता है। रोमानिया में रहने वाले जर्मन चाहे वे बुद्धिजीवी, लेखक, मजदूर या किसान हों, सभी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी की ओर पलायन करने पर मजबूर हैं और मजबूर हैं अभी तक के जाने-पहचाने जीवन से विदा लेने को और अजनबी अनजाना जीवन अपनाने को। पर इस पलायन की मजबूरी की भी उन्हें कीमत चुकानी पड़ती है - जो कुछ थोड़ा बहुत भी आत्मसम्मान उनके पास बचा है उसे भी भीषण भ्रष्टाचार के आगे माथा टेकना पड़ता है। अमाली का ‘काँच का आँसू’ उस बेघर होने वाले समाज की लाचारी का रूपक है।

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-666-2

Author:HERTA MULLER & NAMITA KHARE, RAJENDRA DENGLE

Translation:अनुवादकों के संदर्भ में - नमिता खरे पिछले तेरह वर्षों से जर्मन अध्यापन तथा हिन्दी व जर्मन साहित्य के अनुवाद में कार्यरत। ई-मेल: ​ namitakhare@hotmail.com राजेन्द्र डेंगले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जर्मन भाषा, साहित्य व संस्कृति विभाग में अध्यापन। विशेषज्ञता: आधुनिक जर्मन साहित्य, साहित्यिक सिद्धान्त, भाषा-दर्शन व नया मीडिया का सिद्धान्त। आधुनिक मराठी व हिन्दी साहित्य का जर्मन में अनुवाद। ई-मेल: ​rajoodengle@hotmail.com

Pages:103

MRP:Rs.200/-

Stock:In Stock

Rs.200/-

Details

‘डेर मेन्श डस्ट आडन ग्रोस्सर फ़सान आउफ डेर वेल्ट’ एक रोमानियाई मुहावरे का जर्मन अनुवाद है, जिसका अर्थ है कि इंसान इस दुनिया में एक बड़े तीतर की तरह लाचार है, यह हेर्टा म्युलर का पहला वृत्तान्त है जिसका विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है, मसलन अंग्रेजी में ‘पासपोर्ट’ के नाम से। हिन्दी में भी सबसे पहले ‘काँच के आँसू’ को ही मूल जर्मन से अनूदित किया गया है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद के शान्ति समझौतों में ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य का बनात नामक प्रदेश तीन देशों में बाँट दिया गया था - यूगोस्लाविया, हंगरी और रोमानिया। ‘काँच के आँसू’ रोमानिया के बनात प्रान्त में रहने वाले एक जर्मन-भाषी गाँव की कहानी है, जो अपने में लिप्त दुनिया में जीता है और जिसके लिए सब कुछ जर्मन ही महत्त्वपूर्ण है और रोमानियाई चीजें और लोग तुच्छ हैं; यह रवैया रोजमर्रा के व्यवहार में भी झलकता है जैसे रोमानियावासियों को वलाक़ी बुलाना और उन्हें हेय दृष्टि से देखना या फिर पात्रों का कहना कि रोमानियावासियों की कब्रें भी जर्मनों की कब्रों से अलग महकती हैं या कि बनात का मौसम ऑस्ट्रिया से आता है, न कि बुखारेस्ट से। इनके लिए इतिहास में दरिन्दगी का पर्याय बनी नात्सी काल की एस. एस. सेना भी गौरव की सूचक है। इसमें पासपोर्ट के लिए एक चक्की वाले विंडिश की अथक कोशिशों का विवरण है। यह कहानी शुरू होती है इस वाक्य से - जब से विंडिश विदेश में बसना चाह रहा है, उसे गाँव में हर तरफ अन्तर नजर आता है। रोमानिया में रहने वाले जर्मन चाहे वे बुद्धिजीवी, लेखक, मजदूर या किसान हों, सभी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी की ओर पलायन करने पर मजबूर हैं और मजबूर हैं अभी तक के जाने-पहचाने जीवन से विदा लेने को और अजनबी अनजाना जीवन अपनाने को। पर इस पलायन की मजबूरी की भी उन्हें कीमत चुकानी पड़ती है - जो कुछ थोड़ा बहुत भी आत्मसम्मान उनके पास बचा है उसे भी भीषण भ्रष्टाचार के आगे माथा टेकना पड़ता है। अमाली का ‘काँच का आँसू’ उस बेघर होने वाले समाज की लाचारी का रूपक है।

Additional Information

अनुवादकों के संदर्भ में - नमिता खरे पिछले तेरह वर्षों से जर्मन अध्यापन तथा हिन्दी व जर्मन साहित्य के अनुवाद में कार्यरत। ई-मेल: ​ namitakhare@hotmail.com राजेन्द्र डेंगले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जर्मन भाषा, साहित्य व संस्कृति विभाग में अध्यापन। विशेषज्ञता: आधुनिक जर्मन साहित्य, साहित्यिक सिद्धान्त, भाषा-दर्शन व नया मीडिया का सिद्धान्त। आधुनिक मराठी व हिन्दी साहित्य का जर्मन में अनुवाद। ई-मेल: ​rajoodengle@hotmail.com

About the writer

Herta Muller

Herta Muller जन्म 17 अगस्त, 1953 में रोमानिया के नित्सकीडॉर्फ नामक गाँव में हुआ। 1973 से 1976 तक इन्होंने जर्मन और रोमानियाई साहित्य, भाषा और संस्कृति का अध्ययन किया और एक कारखाने में बतौर अनुवादिका नियुक्त हो गयीं। लेकिन जब इन्होंने खुफिया विभाग ‘सिक्योरिताते’ को सहयोग देने से इनकार कर दिया तो इन्हें यह काम छोड़ना पड़ा। तब इन्होंने 1979 से 1983 तक जर्मन शिक्षिका के रूप में काम किया और 1984 से स्वतन्त्र लेखन आरम्भ कर दिया। मार्च 1987 से ये जर्मनी की प्रवासी हैं। इन्हें अनेक साहित्य पुरस्कारों से सम्मानित होने के बाद वर्ष 2009 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

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