LOKGEETON KA BUGCHA

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-694-5

Author:NIRMAL

Pages:464

MRP:Rs.495/-

Stock:In Stock

Rs.495/-

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लोकगीतों का बुगचा

Additional Information

आधुनिकता के इस दौर में विवाह-शादियों में होने वाली डी.जे. पार्टी, बाजार द्वारा प्रायोजित टी.वी. सीरियल, तकनीकी विकास की देन मोबाइल, कम्प्यूटर, इण्टरनेट आदि ने लोक साहित्य को बहुत कमजोर किया है। आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में स्वयं को आधुनिक दिखाने के लिए हम अपनी लोक पहचान, लोक भाषा व लोक साहित्य को कहीं उजागर नहीं करते और पाश्चात्य संस्कृति के भ्रमजाल में अपनी चाल भूल बैठे हैं। मशीनीकरण ने जीवनचर्या को आसान बना दिया लेकिन साथ ही लोक साहित्य के स्वरूप को भी बदला है। मशीन के युग में मनोरंजन के साधन तो बहुत हैं लेकिन दादी-नानी के गीतों की पीड़ा, रस और अर्थ शायद नहीं है। बदलती समाज व्यवस्था, टूटते परिवार, बिगड़ते रिश्तों व भागदौड़ की जिन्दगी में व्यक्ति अपनी विकासशील परम्पराओं को पीछे छोड़ता जा रहा है। अब महिलाएँ खुद कहने लगी हैं- 'भूल गये घोड़ी भूल गये जकड़ी तीन चीज याद रहगी नूण तेल लकड़ी' नूण, तेल और लकड़ी की चिन्ता से थोड़ी देर की मुक्ति के लिए लोकगीतों का बचा रहना जरूरी है। इन गीतों में हमारा पूरा समाज अपने सुख-दुख, चिन्ताओं, उल्लास व सम्पूर्ण चेतना के साथ उभरकर सामने आता है।

About the writer

NIRMAL

NIRMAL निर्मल जन्म: 5 अगस्त,1987 को गाँव डिंग मंडी, सिरसा। माता : श्रीमती सावित्री देवी पिता : श्री दलीप सिंह शिक्षा : प्राथमिक शिक्षा- गाँव डिंग मंडी के सरकारी स्कूल से। उच्च शिक्षा : महिला महाविद्यालय भोडिया खेड़ा, फतेहाबाद से स्नातक। स्नातकोत्तर, एम.फिल. (स्वर्ण पदक) कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र उर्दू में सर्टिफिकेट तथा डिप्लोमा इन उर्दू पी.जी. डिप्लोमा इन मास कम्युनिकेशन। लेखिका पिछले छह वर्षों से छात्र संगठन व लेखक संघ में सक्रिय हैं। आपकी सामाजिक एवं प्रगतिशील आन्दोलनों में विशेष रुचि रही है। लोक साहित्य के अलावा समसामयिक विषयों पर लेख एवं कविता लेखन में पुरस्कृत।

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