TEEN SAU TEES KAHAVATI KAHANIYAN

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-608-2

Author:ABHAY KUMAR THAKUR

Pages:472

MRP:Rs.350/-

Stock:In Stock

Rs.350/-

Details

सेठां! थांरी छुरी हेटै पड़गी, के डोफा आ तौ कलम है के म्हारै गळै तौ आ इज फिरी। सेठजी! आपकी छुरी नीचे गिर गयी कि बेवकूफ यह तो कलम है कि मेरे गले पर तो यही फिरी थी। इसकी सन्दर्भ-कथा छोटी होते हुए भी बहुत मार्मिक है। एक बनिया बगल में बही दबाये और कान में कलम खोंसे हुए अपनी हाट पर जा रहा था। पीली पगड़ी। नीची मूँछें। एक भुक्त-भोगी असामी उसके पीछे नंगे पाँव चल रहा था। फटी धोती और चिंदी-चिंदी मैले-कुचैले साफे के अलावा उसके शरीर पर कुछ भी बेकार कपड़ा नहीं था। सिर और अंग की लाज ढकना जरूरी था। अचानक किसी चीज के गिरने की हलकी-सी भनक उसके कानों में पड़ी। उसने अपनी नैतिक जिम्मेदारी का निबाह करते हुए सेठजी को आवाज देकर कहा, ‘सेठजी! आपकी छुरी नीचे गिर गयी।’ सेठ ने चौंककर पीछे देखा। आश्चर्य से दोहराया, ‘छुरी? कैसी छुरी? मुझे छुरी से क्या वास्ता?’ तब निरीह असामी ने सहज भाव से इशारा करते हुए कहा, ‘यह पड़ी है, न?’ अब कहीं सेठ को उस गँवार की बेवकूफी नजर आयी। व्यंग्य में मुस्कराते कहा, ‘मूर्ख कहीं का, यह तो मेरी कलम है, कलम!’ मूर्ख असामी ने रुँधे गले से कहा, ‘लेकिन मेरे गले पर तो यही चली थी।’ सेठ ने कुछ भी जवाब नहीं देकर चुपचाप अपनी कलम उठाई, कान में खोंसी और खँखारकर अपनी राह पकड़ी। जाने कितनी अर्थच्छटाएँ इस कहावत में सन्निहित हैं। श्रेष्ठ वस्तु भी यदि बुरे काम में आये तो वह बुरी ही है। बोहरे की कलम भी किसी आततायी की तलवार से कम नहीं होती। शोषण करने के अपने-अपने हथियार होते हैं और अपने-अपने तरीके। और हर तरीके की अपनी-अपनी हिंस्त्र-बर्बरता होती है।

Additional Information

एक बार दो मित्र चाँदनी रात में नदी के किनारे घूम रहे थे। एक मित्र को अचानक पानी के बहाव में काला-स्याह एक कम्बल तैरता नजर आया तो वह धीरज नहीं रख सका। लालची भी कुछ जरूरत से ज्यादा था। कपड़ों सहित नदी में छलाँग मारी और कम्बल को बायें हाथ से पकड़ लिया। पर आश्चर्य कि दूसरे ही क्षण कम्बल उसे अपनी ओर खींचने लगा तो वह जोर-जोर से चिल्लाया, रीछ...रीछ...रीछ। मित्र ने किनारे पर खड़े-खड़े ही सलाह दी - छोड़ दे...छोड़ दे। तब मित्र ने हताश होकर कहा, ‘म्हैं तौ छोडूँ पण कांबळ नीं छोड़ै।’ वह तो छोड़ने को तैयार था, लेकिन कम्बल उसे नहीं छोड़ रहा था। लालच में फँसने के बाद छुटकारा पाना आसान नहीं है। अपनी विकास यात्रा के दौरान मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञान, धर्म, दर्शन, सम्प्रदाय और जाति-रिश्तों को आवश्यकतानुसार ईजाद किया, पर एक बार अस्तित्व में आने के बाद मनुष्य की तमाम सृष्टि ने कम्बल की नाईं उसे ही जकड़ लिया। वह छोड़ना चाहे तब भी कम्बल उसे नहीं छोड़ेगा, उसे नोच-नोचकर निगल जाएगा। मनुष्य अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कोई भी पेशा चुनता है, किन्तु कुछ समय बीतने के बाद वह पेशा ही उसे अपने नागपाश में आबद्ध कर लेता है। आधुनिक सभ्यता के नाम पर मनुष्य ने क्या-क्या करतब नहीं रचे! पर साथ-ही-साथ उसने विध्वंसक हथियारों की होड़ में भी कोई कसर नहीं रखी। मनुष्य ही समूचे विकास का नियंता है और वही समूचे विनाश का एकमात्रा कारण बनेगा। म्हे ई खेल्या अर म्हे ई ढाया। हम ही खेले और हमने ही बिखेरे। हमने ही घरौंदे बनाये और हमने ही ढहाये। यह कहावत समष्टि के लिए भी उपयुक्त है और व्यष्टि के लिए भी कि मनुष्य बचपन और युवा अवस्था में कई नये-नये खेल खेलता है और उन्हें भूलता रहता है।

About the writer

VIJAYDAN DETHA

VIJAYDAN DETHA विजयदान देथा, जिन्हें उनके मित्र प्यार से बिज्जी कहते हैं, राजस्थानी के प्रमुख लेखक हैं। वे हिन्दी में भी लिखते रहे हैं। देथा ने आठ सौ से अधिक कहानियाँ लिखी हैं, जिनमें से अनेक का अनुवाद हिन्दी, अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में हो चुका है। राजस्थान की लोक कथाओं और कहावतों के संग्रह एवं पुनर्लेखन के क्षेत्रा में विजयदान देथा का योगदान विश्व स्तर पर समादृत है। उनकी कहानियों पर आधारित तीन हिन्दी फिल्में - दुविधा, पहेली और परिणीता - बन चुकी हैं और चरनदास चोर सहित अनेक नाटक लिखे और मंचित हो चुके हैं। साहित्य अकादेमी तथा अन्य अनेक पुरस्कारों से सम्मानित। कुछ प्रमुख कृतियाँ: बातारी फुलवारी (13 खण्ड), रूँख, दुविधा और अन्य कहानियाँ, उलझन, सपनप्रिया, अन्तराल तथा राजस्थानी-हिन्दी कहावत कोश। राजस्थानी लोक गीत (6 भाग) का संकलन-सम्पादन।

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