SACHCHA JHOOTH

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-776-8

Author:VINOD BHARDWAJ

Pages:110

MRP:Rs.250/-

Stock:In Stock

Rs.250/-

Details

विनोद भारद्वाज ने भारतीय आधुनिक कला की दुनिया के ग्लैमर और अँधेरे को लेकर अपना पहला हिन्दी उपन्यास ‘सेप्पुकु’ (वाणी प्रकाशन) लिखा, तो हिन्दी की दुनिया में उसकी पर्याप्त चर्चा हुई। अब उसका अँग्रेजी अनुवाद भी छप रहा है। विनोद भारद्वाज का नया उपन्यास ‘सच्चा झूठ’ पाठक को हिन्दी पत्राकारिता की विचित्रा दुनिया में ले जाता है। सत्तर के दशक के प्रारम्भ में हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार पत्राकारिता में सक्रिय हुए, तो छोटे शहरों से असंख्य युवा लेखक मुम्बई और दिल्ली सरीखे महानगरों में पत्राकारिता में कुछ सार्थक करने के इरादे से आ गये। धीरे-धीरे जब बड़े संस्थानों ने सम्पादकों से अधिक ब्रांड मैनेजरों की बात सुननी शुरू कर दी, तो पत्रकारिता की दुनिया में महत्त्वपूर्ण बदलाव आये। साहित्यकारों का मोहभंग होना शुरू हुआ। रंगीन टेलीविजन ने भी पत्राकारिता को नष्ट-भ्रष्ट किया। ‘सच्चा झूठ’ का नायक सुधीर ऐसा ही एक प्रतिभाशाली युवा लेखक है जो फाफामऊ में जन्मा, लखनऊ में पला-बढ़ा और मुम्बई और दिल्ली की आधुनिक दुनिया में पत्रकारिता और लेखन के बड़े सपने लेकर आया। बचपन में हुए पुरुष बलात्कार की त्रासद स्मृतियों से जूझ रहा सुधीर जीवन भर स्त्रियों से भी जटिल सम्बन्धों के एक विचित्र सच्चे झूठ की भूलभुलैया में फँसा रहा। यह उपन्यास दो स्तरों पर कहानी को आगे बढ़ाता है-एक ओर पत्रकारिता की निरन्तर बदलती दुनिया है और दूसरी ओर स्त्रियों से जटिल सम्बन्धों की दुनिया है। वास्तविक घटनाओं और स्थितियों से दूर जाकर पन्द्रह सालों की चुप्पी के बाद सुधीर आत्मस्वीकृति के अँधेरे और रोशनी में अपने जीवन की एक बेरहम जाँच शुरू करता है। ‘सेप्पुक’ की शैली में ही लिखा गया उपन्यास ‘सच्चा झूठ’ हिन्दी पत्रकारिता और स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की एक निर्मम और निष्पक्ष जाँच भी है।

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