ROUSHANDAAN

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-727-0

Author:Javed Siddiqi

Pages:176

MRP:Rs.400/-

Stock:In Stock

Rs.400/-

Details

ख़ुदा जाने फ़रिश्तों के दिल में क्या आयी कि मुझे रामपुर के एक ऐसे ख़ानदान में तक्श्सीम कर दिया जहाँ पढ़ने-लिखने का रिवाज़ कुछ जश्रूरत से ज़्यादा ही था। इस ख़ानदान ने अली बिरादरान यानी मौलाना मुहम्मद अली और मौलाना शौकत अली के अलावा और भी बहुत से नामी लोगों को जन्म दिया। जिनमें एक मशहूर पेंटर शाकिर अली भी हैं। इसी ख़ानदान में हाफ़िज़ अहमद अली ख़ाँ शौक़ भी थे जो रज़ा लायब्रेरी के पहले लायब्रेरियन थे (जब ये शाही कुतुब ख़ाना कहलाता था) और वो पहले आदमी थे जिन्होंने अंग्रेज़ी तर्ज़ पर लायब्रेेरी कैटलॉग बनवाया जो आज भी रज़ा लायब्रेरी में मौजूद है। ये बुजुर्ग मेरे परदादा थे। आँखों ने देखने का सलीक़ा सीखा तो पहली नजर उन हज़ारों किताबों पर पड़ी जो परदादा की कोठी में इस तरह पड़ी हुई थीं कि धूल और दीमक के सिवा उनका कोई पुरसाने हाल नहीं था। पता नहीं क्यूँ मुझे उन किताबों पर बड़ा रहम आया और मैंने सैकड़ों किताबें जो वक़्त की दस्त बुर्द से बच गयी थीं पढ़ डालीं। कुछ समझ में आयीं कुछ नहीं आयीं मगर पढ़ने का ऐसा चस्का लगा कि ये बुरी आदत आज तक नहीं छूटी। सतरह बरस की उम्र में बम्बई आ गया जहाँ अपने ख़ानदानी अख़बार ‘ख़िलाफ़त’ में सहाफ़ी की हैसियत से काम करता रहा और फिर अपना अख़बार निकाला जिससे 1975 तक वाबस्ता रहा। सहाफ़त के साथ जिस चीज़ ने मुझे अपनी तरफ़ मुतवज्जा किया वो ड्रामा था। 1968 में इप्टा से वाबस्ता हुआ और आज तक इससे जुड़ा हुआ हूँ। अख़बारनवीसी छोड़ी तो फ़िल्मनवीसी शुरू कर दी, अब तक 90 से ज़्यादा फ़िल्में रिलीज़ हो चुकी हैं। ये सच है कि फ़िल्मों ने मुझे दौलत भी दी और शोहरत भी मगर वो तख़्लीक़ी तसल्ली ना मिल सकी जिसकी तलाश थी। एक दिन जब तन्हा बैठा हुआ ग़में जहाँ का हिसाब कर रहा था तो कुछ लोग बेहिसाब याद आये, उनकी जलती-बुझती यादों को काग़ज़ पर जमा किया तो कुछ ख़ाके तैयार हो गये। मेरी खुशकिस्मती कि इन ख़ाकों को अदब नवाज़ें ने हाथों-हाथ लिया और इतनी हिम्मत बढ़ाई कि किताब की अशाअत की जुर्रअत कर रहा हूँ। मेरी ये कोशिश अदबी है या बेअदबी इसकाफ़ैसला पढ़ने वालों पर! ”सर झुका है जो भी अब अरबाबे मै-ख़ाना कहें“

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