AADHUNIK KAHANI : GERMANY

Original Book/Language: आधुनिक कहानी: जर्मनी बाहर खुले में, जब कोई देख न रहा हो, काग़जष् से पोंछने वाली हमारी प्रथा को भारतीय बहुत अस्वच्छ समझते हैं, वे अपना मशहूर चमचमाता पीतल का लोटा लेकर खेत को जाते हैं और बाद में वे उसे पानी से धोते हैं। भारतीय खाना बनाना भी मैंने शुरू कर दिया है। चपातियाँ बनाती हूँ, अनेकों अपरिचित मसाले इस्तेमाल करती हूँ; अब मैं घण्टों उकडँ़ू बैठ सकती हूँ, नीचे बैठ कर खाना पका सकती हूँ और कपड़े धो सकती हूँµपरन्तु फिर भी मैं कभी इतनी जर्मन नहीं थी, जितनी अब हूँ। अचानक अन्तर नजष्रों के सामने आ जाते हैं, स्वाधीन विचारधारा रखने वाला पूरा पश्चिमी जगत एक नये रूप में सामने आता है, उसकी अच्छाइयाँ समझ में आती हैं। कभी तुम जष्रा इन गारे के मकानों में झाँककर देखो भारतीय महिलाओं का हाल, कैसे उन्हें अज्ञान तथा परम्परा की बेड़ियों में जकड़ कर रखा जाता है, वे घर से बाहर नहीं निकल सकतीं, क्योंकि इसे अशिष्टता समझा जाता है, कम से कम गाँवों में तो; वे कैसे गन्दी बनी, बिना बनाव-शृंगार के, अस्वस्थ तथा अन्धविश्वास भरा जीवन जी रही हैं, कैसे किसी मर्द के सामने पड़ जाने पर वे साड़ी से चेहरा ढँक लेती हैं, कैसे वे गुलामी करती हैं और कैसे वे एक-दूसरे से लड़ती-झगड़ती है।

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-835-5

Author:AMRIT MEHTA

Translation:

Pages:172

MRP:Rs.395/-

Stock:In Stock

Rs.395/-

Details

आधुनिक कहानी: जर्मनी बाहर खुले में, जब कोई देख न रहा हो, काग़जष् से पोंछने वाली हमारी प्रथा को भारतीय बहुत अस्वच्छ समझते हैं, वे अपना मशहूर चमचमाता पीतल का लोटा लेकर खेत को जाते हैं और बाद में वे उसे पानी से धोते हैं। भारतीय खाना बनाना भी मैंने शुरू कर दिया है। चपातियाँ बनाती हूँ, अनेकों अपरिचित मसाले इस्तेमाल करती हूँ; अब मैं घण्टों उकडँ़ू बैठ सकती हूँ, नीचे बैठ कर खाना पका सकती हूँ और कपड़े धो सकती हूँµपरन्तु फिर भी मैं कभी इतनी जर्मन नहीं थी, जितनी अब हूँ। अचानक अन्तर नजष्रों के सामने आ जाते हैं, स्वाधीन विचारधारा रखने वाला पूरा पश्चिमी जगत एक नये रूप में सामने आता है, उसकी अच्छाइयाँ समझ में आती हैं। कभी तुम जष्रा इन गारे के मकानों में झाँककर देखो भारतीय महिलाओं का हाल, कैसे उन्हें अज्ञान तथा परम्परा की बेड़ियों में जकड़ कर रखा जाता है, वे घर से बाहर नहीं निकल सकतीं, क्योंकि इसे अशिष्टता समझा जाता है, कम से कम गाँवों में तो; वे कैसे गन्दी बनी, बिना बनाव-शृंगार के, अस्वस्थ तथा अन्धविश्वास भरा जीवन जी रही हैं, कैसे किसी मर्द के सामने पड़ जाने पर वे साड़ी से चेहरा ढँक लेती हैं, कैसे वे गुलामी करती हैं और कैसे वे एक-दूसरे से लड़ती-झगड़ती है।

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