PRIYA SAINI : STREE AUR DESH

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-765-2

Author:Markandey

Pages:118

MRP:Rs.250/-

Stock:In Stock

Rs.250/-

Details

प्रिया सैनी: स्त्री और देश समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में मार्कण्डेय की कहानियों के स्त्री पात्र हमारे लिए कहीं अधिक प्रासंगिक और जरूरी लगने लगते हैं। पितृसत्तात्मक नैतिकता की आचरण-संहिता से लोहा लेती आज की स्त्राी के लिए ‘सूर्या’ कहानी की सूर्या, और ‘रेखाएँ’ कहानी की नीहार रोल मॉडल का काम कर सकती हैं। जिस दृढ़ता के साथ माही, सूर्या, प्रिया आदि लड़कियाँ अपने चयन को जायज ठहराती और अपना अधिकार साबित करती हुई खड़ी हैं, वह दुनिया के किसी भी कोने में चलने वाले स्त्री-आन्दोलन के लिए अनुकरणीय है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो ये है कि ये लड़कियाँ पितृसत्ता से संघर्ष करती हुई अपने प्रेमी/पति के विरुद्ध भी जाती हैं। जहाँ पिता और भाई के फैसले का विरोध करना धृष्टता/दुश्चरित्राता; और पति की अवज्ञा को महापाप माना जाता हो वहाँ ‘एक दिन की डायरी’ कहानी की सुशीला, ‘कहानी के लिए नारी पात्रा चाहिए’ कहानी की जमुना आदि स्त्राी पात्रों को केन्द्र में रखकर मार्कण्डेय एक क्रान्तिकारी और समाज के लिए दूरगामी परिणामों वाला समाधान पेश करते हैं। यही समाधान हमारे लिए सहज और मुफीद भी है। आज के स्त्री आन्दोलन को मार्कण्डेय की कहानियों से यह तत्त्व तो ग्रहण करना ही चाहिए कि स्त्री-जीवन की सहजता को बाधित करने वाली हर पुरुष-सत्तात्मक ताकत से आजादी को सर्वोपरि रखना होगा, सिर्फ खाप से आजादी, भाई-बाप से आजादी ही नहीं, बल्कि पति से, प्रेमी से भी आजादी का नारा बुलन्द करना होगा। (भूमिका से)

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About the writer

Markandey

Markandey मार्कण्डेय जन्म: 2 मई 1930, बराई गाँव, जिला-जौनपुर। शिक्षा: ककहरा, गाँव में, आगे की पढ़ाई प्रतापगढ़, विश्वविद्यालयीन शिक्षा इलाहाबाद। उन दिनों प्रतापगढ़ में चलने वाले किसान आन्दोलन से प्रभावित। अवध के तालुकेदारियों मंे होने वाले किसानों के भयावह शोषण ने दिलोदिमाग में गहरा असर डाला। भूमिहीनों व किसानों के शोषण और दुर्दशा के विभिन्न आयामों पर अनेक कहानियाँ लिखीं। प्रमुख कहानी संग्रह: ‘पान-फूल’, ‘महुए का पेड़’, ‘हंसा जाई अकेला’, ‘भूदान’, ‘माही’, ‘सहज और शुभ’, ‘बीच के लोग’ और ‘हलयोग’। उपन्यास: ‘सेमल के फूल’, ‘अग्निबीज’। एकांकी संग्रह: ‘पत्थर और परछाइयाँ’। काव्य संग्रह: ‘सपने तुम्हारे थे’, ‘यह पृथ्वी तुम्हें देता हूँ’। आलोचना: ‘कहानी की बात’, ‘नयी कहानी की उपलब्धियाँ’। साहित्य संवाद: ‘कल्पना’ में चक्रधर नाम से लिखा गया स्तम्भ ‘साहित्यधारा’। ‘चक्रधर की साहित्यधारा’ नाम से प्रकाशित। निधन: 18 मार्च, 2010

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