DHARM AUR DHARMSATTA

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-800-0

Author:RAJ KISHORE

Pages:156

MRP:Rs.350/-

Stock:In Stock

Rs.350/-

Details

धर्म और धर्मसत्ता

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धर्म में सत्ता का तत्त्व हो, यह बात समझ में नहीं आती, लेकिन धर्म जहाँ भी पाया जाता है, अपनी सत्ता के साथ ही पाया जाता है। सच तो यह है कि व्यक्ति का धर्म धर्म नहीं होता। वह उसका अपना विचार होता है। धर्म को अगर व्यक्तिगत मामला बना दिया जाए, तो धर्म का अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा। वास्तव में, एक विचारधारा के रूप में धर्म का अस्तित्व समुदाय से है। कोई भी समुदाय अपनी शक्ति या संख्या कम नहीं करना चाहता, इसीलिए जन्मना हिन्दू या जन्मना मुसलमान जैसी घटना अभी भी अस्तित्व में है। वरना चेतना के विकास के साथ-साथ जन्म से जुड़े इस तर्क को कभी का ख़त्म हो जाना चाहिए था। हम सभी जानते हैं कि ईश्वर किसी को हिन्दू या मुसलमान बना कर नहीं भेजता, ‘पुण्य' का यह काम हम ख़ुद करते हैं। परन्तु मनुष्य की इस अधिनायकवादी क्षमता को किसी भी धर्मशास्त्र में चुनौती नहीं दी गयी है। वास्तव में धर्म के खिलाफ पहला तर्क यहीं से पैदा होता है। क्या यह बात अजीब नहीं लगती कि व्यक्ति धर्म को नहीं चुनता, बल्कि धर्म ही व्यक्ति को चुनता है? मानो धर्म झाड़ी में दुबका हुआ कोई जानवर हो जो किसी का जन्म होते ही उस पर हमला कर देता है। ख़ुद धर्म में इतनी शक्ति नहीं होती कि वह आदमी को अपनी ओर आकर्षित करे। इसीलिए धर्म के प्रसार में माँ-बाप का सहारा लिया जाता है, जिनके सामने हर बच्चा असहाय होता है। कितना अच्छा हो, अगर बच्चों को, जन्म लेते ही, समाज से अलग करने का कार्यक्रम कुछ समय तक चलाया जाए। तभी उसका समग्र विकास हो सकता है। अपनी सन्तान पर अपना धर्म लादने की कुप्रथा ख़त्म हो जाए, तो देखना है कि पचास साल बाद कितने हिन्दू रह जाते हैं, कितने मुसलमान और कितने सिख।

About the writer

RAJ KISHORE

RAJ KISHORE राजकिशोर 2 जनवरी 1947 को कलकत्ता में जन्म। शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), एलएल.बी. तथा बी. कॉम. (ऑनस)। पत्रकारिता की शुरुआत अगस्त 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'रविवार' से। 1986-87 में साप्ताहिक 'परिवर्तन' का संपादन किया। 1987 से 1990 तक 'रविवार' के संयुक्त संपादक। 1990 से 1996 तक नवभारत टाइम्स, दिल्ली में वरिष्ठ सहायक संपादक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। मुख्यतः राजनीति, समाज एवं आर्थिक विषयों पर लेखन। संप्रति प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' के संयुक्त संपादक। अन्य प्रकाशन : पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य, आजादी एक अधूरा शब्द है, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति, हिन्दी लेखक और उसका समाज, जाति कौन तोड़ेगा तथा तुम्हारा सुख (उपन्यास)। संपादन : समकालीन पत्रकारिता : मूल्यांकन और मुद्दे। सह-संपादन : मुसलमान क्या सोचते हैं। लोकप्रिय पुस्तक श्रृंखला ‘आज के प्रश्न' के संपादक, जिसके अंतर्गत अब तक 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पुरस्कार और सम्मान : पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1988 में लोहिया पुरस्कार, 1990 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान तथा 1995 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार। 1996 में मध्य प्रदेश सरकार की राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता फेलोशिप।

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