DERIDA : VIKHANDAN KI SAIDHANTIKEE

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-518-4

Author:SUDHISH PACHAURI

Pages:

MRP:Rs.425/-

Stock:In Stock

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देरिदा का विखण्डन ‘अन्तिम शब्द’ नहीं कहता। वह एक टैक्स्ट की अर्थ की अस्थिरता को मानता है, अर्थ के लगातार स्थगन को मानता है और किसी भी अन्तिम व्याख्या और अन्तिम अर्थ को नहीं मानता। इसका कारण यह है कि विखण्डन भाषा एवं लेखन के रूप को, शक्तियों के भीतर सक्रिय ‘अनन्तार्थता’ की सत्ता को स्वीकार करके चलता है। विखण्डन कहता है कि टैक्रट के बारह खड़े होकर भी कोई समीक्षा सिर्फ एक ‘टैक्स्ट’ ही बनती है, विज्ञान नहीं बनती। सत्य की ठेकेदार नहीं बन जाती। विखण्डन और मार्क्सवादी समीक्षा कका भेद और भिड़न्त हम यहां स्पष्ट देख सकते हैं। जेमेसन, ईगलटन, पियरे माशेरे तक आते-आते संरचना के रास्ते बहुत से ऐसे तत्त्व मार्क्सवादी समीक्षा ने अपने को पूर्ण करने के लिए अपनाए हैं जिन्हें हम काफी दूर तक उत्तर-संरचनावादी कह सकते हैं। जेमसन का संरचनावादी ‘खेल’ को स्वीकारना, ईगलटन का ‘टैक्स्ट’ को आलंकारिक मानना या माशेरे का ‘टैक्स्ट’ को ‘यादृच्छिक’ एवं विमर्शात्मक मानना बताता है कि मार्क्सवादी समीक्षक विखण्ड के दबाव से बचे नहीं रहे सके हैं।

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About the writer

SUDHISH PACHAURI

SUDHISH PACHAURI जन्मः 29 दिसम्बर, जनपद अलीगढ़। शिक्षाः एम.ए. (हिन्दी) (आगरा विश्वविद्यालय), पीएच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टरोल शोध (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली। मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तम्भकार, मीडिया विशेषज्ञ। चर्चित पुस्तकेंः नई कविता का वैचारिक आधार; कविता का अन्त; दूरदर्शन की भूमिका; दूरदर्शनः स्वायत्तता और स्वतन्त्राता (सं.); उत्तर-आधुनिक परिदृश्य; उत्तर-आधुनिकता और उत्तर संरचनावाद; नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति; नामवर के विमर्श (सं.); उत्तर-आधुनिक साहित्य विमर्श; दूरदर्शनः विकास से बाजशर तक; उत्तर-आधुनिक साहित्यिक-विमर्श; देरिदा का विखण्डन और विखण्डन में ‘कामायनी’; मीडिया और साहित्य; टीवी टाइम्स; साहित्य का उत्तरकाण्ड; अशोक वाजपेयी पाठ कुपाठ (सं.); प्रसार भारती और प्रसारण-परिदृश्य; दूरदर्शनः सम्प्रेषण और संस्कृति, स्त्राी देह के विमर्श; आलोचना से आगे; मीडिया, जनतन्त्रा और आतंकवाद; निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद; विभक्ति और विखण्डन; हिन्दुत्व और उत्तर- आधुनिकता; मीडिया की परख; पॉपूलर कल्चर; भूमण्डलीकरण, बाजशर और हिन्दी; टेलीविजन समीक्षाः सिद्धान्त और व्यवहार; उत्तर-आधुनिक मीडिया विमर्श; विंदास बाबू की डायरी; फासीवादी संस्कृति और पॉप-संस्कृति। सम्मानः मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का रामचन्द्र शुक्ल सम्मान (देरिदा का विखण्डन और विखण्डन में ‘कामायनी’); भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से सम्मानित; दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा ‘साहित्यकार’ का सम्मान। सम्प्रतिः डीन ऑफ कॉलेजिज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

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