TRP, TV NEWS AUR BAZAR

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-868-0

Author:DR. MUKESH KUMAR

Pages:226

MRP:Rs.395/-

Stock:In Stock

Rs.395/-

Details

टेलीविजन चैनलों के सम्बन्ध में होने वाली तमाम चर्चाओं में टीआरपी का जिक्र लाजिमी तौर पर आ जाता है। मीडिया से जुड़े लोग या प्रबुद्ध जन ही नहीं, आम दर्शक भी अब बखूबी जानते हैं कि टीवी चैनल टीआरपी की होड़ में आगे निकलने के लिए तरह-तरह के तमाशे और प्रपंच रचते रहते हैं। चैनल अगर किसी ख़बर को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं, उसे तोड़ते-मरोड़ते हैं या मसाला-मिर्च लगाकर चटखारेदार बनाते हैं तो इसके पीछे उनकी टीआरपी की अन्तहीन लिप्सा ही होती है। लेकिन ये भी सचाई है कि लोग टीआरपी के बारे में बस इतना ही जानते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। उन्हें पता नहीं होता कि वास्तव में ये टीआरपी है क्या, ये कहाँ से आयी, क्यों आयी और किस तरह से चैनलों को अपने इशारों पर नचा रही है? वे ये तो जानते हैं कि टीआरपी टेलीविजन न्यूज“एवं कार्यक्रमों को प्रभावित कर रही है, मगर इसकी प्रक्रिया से वे अनजान हैं? टेलीविजन को बेहतर ढंग से समझने के लिहाज से ये सवाल बहुत अहमियत रखते हैं, क्योंकि इनका सम्बन्ध केवल टेलीविजन के बदलते चाल, चरित्र और चेहरे से ही नहीं है, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था से भी है। टीवी, बाजार और टीआरपी ये तीनों ही आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं और इनके अन्तसम्बन्ध एक दूसरे को बड़े पैमाने पर प्रभावित भी कर रहे हैं। ऐसे समय में जब हम एक टीवी-समाज में तब्दील कर दिए गए हैं और बाजार टीवी के जरिए हमें उपभोक्ता समाज के रूप में ढालकर सब कुछ अपने स्वार्थ साधने में लगा हो तो ये प्रश्न सीधे मानवीय अस्तित्व से भी जुड़ जाते हैं। मिसाल के लिए अगर इस गँठजोड़ की वजह से पत्रकारिता अपने उद्देश्य से भटक जाती है और चौथे खम्भे के रूप में मीडिया अपनी भूमिका का निर्वाह सही ढंग से नहीं कर पाता तो पूरा लोकतन्त्र ही ख़तरे में पड़ जाता है। हम ये होता हुआ देख भी रहे हैं, ख़ास तौर पर वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य इसकी पक्की गवाही देता है। टेलीविज“न पर बाजार के नियन्त्रण ने उसे लोक तथा लोकतन्त्र दोनों से काट दिया है। यही वजह है कि वह जन समस्याओं को भूल चुका है और जन सरोकारों से उसका सम्बन्ध टूट चुका है। उत्तेजनाओं और भावोन्मादों से खेलना उसका एकमात्र एजेंडा बन गया है। वह परिवर्तन का, गरीबी, विषमता, शोषण, अशिक्षा आदि से लड़ने का औजार नहीं रह गया है। उसे गाँव-देहात, मजदूर-किसान की सुध नहीं रह गयी है। सस्ते मनोरंजक फार्मूलों में बँधकर वह अवाम के लिए अफीम बनकर रह गया है।

Additional Information

डॉ. मुकेश कुमार की ये किताब टीआरपी के तिलिस्म को तोड़ते हुए टेलीविजन, बाजार और उसमें टीआरपी की भूमिका से जुड़े उठने वाले तमामप्रश्नों के सुस्पष्ट उत्तर देती है। पाँच साल के शोध पर आधारित किताब टीआरपी का मायाजाल में टीआरपी के तमाम रहस्यों से परदा उठाती है। ये बताती है कि मुद्दा केवल ये नहीं है कि टीवी चैनलों और उनके कार्यक्रमों की लोकप्रियता को मापने की मौजूदा रेटिंग प्रणाली दोषपूर्ण है या वह भारत जैसे विविधतापूर्ण देश की पसन्द-नापसन्द को ठीक ढंग से बता ही नहीं सकती अथवा वह पारदर्शी नहीं है और उसका बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है। समस्या इससे कहीं ज्यादा बड़ी है। ये किताब तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर साबित करती है कि टीआरपी दरअसल बाजार का औजार है और पूरी टीवी इंडस्ट्री को उसने अपना बंधुआ बना लिया है। किताब बताती है कि न्यूज चैनलों के मौजूदा आर्थिक मॉडल में बाजार के हथियार के तौर पर टीआरपी सबसे ऊपर बैठी है। टीआरपी टीवी कंटेंट की नियंता बन गयी है क्योंकि न्यूज चैनल टीआरपी को केन्द्र में रखकर ही अपनी सम्पादकीय और व्यापारिक नीति बनाते हैं। अब सम्पादकीय सामग्री का फैसला सम्पादक और पत्रकार नहीं करते, टीआरपी के जरिए बाजार करता है, बाज़ार को चलाने वाली शक्तियाँ करती हैं। मुश्किल ये है कि टीआरपी के इस दुष्चक्र का तोड़ किसी के पास नहीं है और कोई तोड़ना भी नहीं चाहता। टीवी उद्योग के विपणन से जुड़े तमाम पक्ष उल्टे सरकार, बाजार और मीडिया संस्थान चाहे-अनचाहे उसे बनाये रखने तथा मजबूत करने में ही जुटे हुए हैं। अगर चंद लोग इसकी मुख़ाल्फत करते भी हैं तो उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती साबित होती है। कुल मिलाकर मीडिया में काम करने वालों और मीडिया पर नजर रखने वालों के लिए तो ये बेहद महत्त्वपूर्ण किताब है ही मगर उनके लिए भी ये बहुत उपयोगी होगी जो मीडिया के जरिए समाज में आ रहे परिवर्तनों को जाँचने-परखने में दिलचस्पी रखते हैं।

About the writer

DR. MUKESH KUMAR

DR. MUKESH KUMAR जन्म ; अक्टूबर, 1964, शहडोल, मध्यप्रदेश में। शिक्षा; टेलीविज न न्यूज और बाज़ार के सम्बन्धों में टीआरपी की भूमिका पर डॉक्टरेट। प्राणिशास्त्र में एम. एससी. और जनसंचार एवं पत्रकारिता में स्नातक। लगभग अट्ठाईस वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता। दैनिक समय, देशबन्धु, माया, सेंटिनल, दैनिक नई दुनिया, समय सूत्रधार आदि में काम करने के बाद बीस साल से टेलीविजन पत्रकारिता। टेलीविजन की दुनिया का जाना पहचाना चेहरा। परख, फिलहाल, कही-अनकही, सुबह सवेरे, साहित्य भारती, आपकी बैठक, राजनीति-खेल सत्ता का, शतरंज के खिलाड़ी, सम्मुख, बात बोलेगी और स्पेशल एजेंडा जैसे चर्चित कार्यक्रमों के प्रस्तोता। कई न्यूज चैनलों के शीर्ष पदों पर काम किया। छह न्यूज चैनलों की सफल शुरूआत जिनमें न्यूज एक्सप्रेस, वॉयस ऑउ इंडिया, सहारा और मौर्य टीवी भी शामिल हैं। भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी पर आधारित टेलीफिल्म कंठा का सह निर्देशन और उसमें अभिनय भी किया। टीवी टुडे द्वारा निर्मित आज की नारी के लिए पटकथा लेखन। इसके अलावा बहुत सारे टीवी कार्यक्रमों और वृत्त चित्रों का निर्माण एवं निर्देशन किया। पुस्तकें - हंस के स्तम्भ में प्रकाशित लेखों का संकलन-कसौटी पर मीडिया। टेलीविजन पत्रकारिता पर आधारित शृंखला के तहत किताबें - टेलीविजन की कहानी और ख़बरें विस्तार से। अनुवाद की दो पुस्तकें प्रकाशित। फ्रांसीसी लेखक गाय सोर्मन की किताब जीनियस ऑफ इंडिया का भारत की आत्मा शीर्षक से और रक्षा विशेषज्ञ श्रीधर एवं पत्रकार महेन्द्र वैद द्वारा लिखित किताब अफगानिस्तान बुजकशी का लहूलुहान अफगानिस्तान के नाम से हिन्दी में। कविता संकलन - साधो! जग बौराना।

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