EK AUR VIBHAJAN

Original Book/Language: बांग्ला भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित. अनुवादक – सुशील गुप्ता

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-140-5

Author:MAHASHWETA DEVI

Translation: यहाँ अपनी भी बात कहना जरूरी हो आया है। सन् 1946 के 16 अगस्त का दिन! उन दिनों में, उस जमाने के। धर दक्षिण कलकत्ते में रहती थी। उन दिनों दक्षिण कलकत्ता, लेक की सीमा तक आकर खत्म हो जाता था । हिन्द महल्ले में रहती थी। वह किसी के विवाह की तारीख थी। विवाह के घर में मुस्लिम शहनाई वाले। रौशनचौकी बनाकर, शहनाई बजाने आये थे। लेकिन, सब लौट नहीं सके, सब कल भी नहीं हुए। उनमें से। बहतेरों को शरण भी मिली थी। वे लोग बच गये। हालाँकि उत्तेजना महा भयंकर थी। मैंने दक्षिण कलकत्ता को । खन में नहाते देखा है। साथ ही इन्सानों को बचाने के लिए, इन्सानों को प्रबल साहस के साथ सड़क पर उतरते । हए भी देखा है। सन् 1964 में, मैं गड़िया में थी। उस वक्त का तजुर्बा भी भयावह था। उन्होंने सपना देखा। उस । सपने को सबमें बिखेर देने का काम, उन्होंने नियमनिष्ठ सिपाही की तरह किया। इसके अलावा भी कितना कुछ। किया है, उस बारे में, मैं भला कितना-सा जानती हूँ। हाँ, जितना कुछ मुझे याद है, उन छोटी-छोटी बातों की ही। बात करू। मुझे याद है, विजयादशमी की सुबह, वे हमारे यहाँ मिठाई लेकर आ पहुँचते थे। वे मेरे बाबू जी को किस निगाह से देखते थे, वह मैं कैसे बताऊँ ? माँ के निधन के बाद, हम जब बहरामपुर गये थे। अपने सहारे । की लाठी, खाजिम अहमद को साथ लेकर, वे हमारे यहाँ आ पहुँचे । दक्षिणी बरामदे में उजाला बिखेरते हुए, वे । बैठ गये और उन्हें घेरकर हम सब वह तस्वीर देखते रहते थे, देखते रह जाते थे। ऐसी शिशुवत् हंसी, ऐसी । स्नेह-मधुर बातें! जाते-जाते उन्होंने हमें दिलासा दिया- मैं हूँ न! जब मन करे, तुम लोग यहाँ चले आना। सच्ची, वे जहाँ बैठे होते थे, उजाला कर देते थे। उनके चरणों में बैठते ही, मन में भरोसा बँधता था। ऐसे सभी इन्सान तो, एक-एक करके, मेरी जिन्दगी से विदा लेते जा रहे हैं। बाबू जी ने लिखा था- 'एक विशाल पेड़, जिसकी फनगी आकाश छुती है। करीम साहब ऐसे ही पेड़ थे। बड़े-बड़े महीरुह के दिन तो अब रहे नहीं! विज्ञान कहता है. आज बरगद या साल का पेड़ लगाओ, तो सौ साल में बड़ा तो हो जायेगा, मगर पहले के पेड़ों की तरह। महीरुह, अब नहीं होगा। जो मिट्टी, बाताश, जल वगैरह पेड़ को महीरुह बनाती थी, वह सब अब नहीं रही। करीम साहब जैसे बड़ी माप के इन्सानों की भी अब पुनरावृत्ति नहीं होगी।।

Pages:96

MRP:Rs.225/-

Stock:In Stock

Rs.225/-

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बांग्ला भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित. अनुवादक – सुशील गुप्ता

Additional Information

यहाँ अपनी भी बात कहना जरूरी हो आया है। सन् 1946 के 16 अगस्त का दिन! उन दिनों में, उस जमाने के। धर दक्षिण कलकत्ते में रहती थी। उन दिनों दक्षिण कलकत्ता, लेक की सीमा तक आकर खत्म हो जाता था । हिन्द महल्ले में रहती थी। वह किसी के विवाह की तारीख थी। विवाह के घर में मुस्लिम शहनाई वाले। रौशनचौकी बनाकर, शहनाई बजाने आये थे। लेकिन, सब लौट नहीं सके, सब कल भी नहीं हुए। उनमें से। बहतेरों को शरण भी मिली थी। वे लोग बच गये। हालाँकि उत्तेजना महा भयंकर थी। मैंने दक्षिण कलकत्ता को । खन में नहाते देखा है। साथ ही इन्सानों को बचाने के लिए, इन्सानों को प्रबल साहस के साथ सड़क पर उतरते । हए भी देखा है। सन् 1964 में, मैं गड़िया में थी। उस वक्त का तजुर्बा भी भयावह था। उन्होंने सपना देखा। उस । सपने को सबमें बिखेर देने का काम, उन्होंने नियमनिष्ठ सिपाही की तरह किया। इसके अलावा भी कितना कुछ। किया है, उस बारे में, मैं भला कितना-सा जानती हूँ। हाँ, जितना कुछ मुझे याद है, उन छोटी-छोटी बातों की ही। बात करू। मुझे याद है, विजयादशमी की सुबह, वे हमारे यहाँ मिठाई लेकर आ पहुँचते थे। वे मेरे बाबू जी को किस निगाह से देखते थे, वह मैं कैसे बताऊँ ? माँ के निधन के बाद, हम जब बहरामपुर गये थे। अपने सहारे । की लाठी, खाजिम अहमद को साथ लेकर, वे हमारे यहाँ आ पहुँचे । दक्षिणी बरामदे में उजाला बिखेरते हुए, वे । बैठ गये और उन्हें घेरकर हम सब वह तस्वीर देखते रहते थे, देखते रह जाते थे। ऐसी शिशुवत् हंसी, ऐसी । स्नेह-मधुर बातें! जाते-जाते उन्होंने हमें दिलासा दिया- मैं हूँ न! जब मन करे, तुम लोग यहाँ चले आना। सच्ची, वे जहाँ बैठे होते थे, उजाला कर देते थे। उनके चरणों में बैठते ही, मन में भरोसा बँधता था। ऐसे सभी इन्सान तो, एक-एक करके, मेरी जिन्दगी से विदा लेते जा रहे हैं। बाबू जी ने लिखा था- 'एक विशाल पेड़, जिसकी फनगी आकाश छुती है। करीम साहब ऐसे ही पेड़ थे। बड़े-बड़े महीरुह के दिन तो अब रहे नहीं! विज्ञान कहता है. आज बरगद या साल का पेड़ लगाओ, तो सौ साल में बड़ा तो हो जायेगा, मगर पहले के पेड़ों की तरह। महीरुह, अब नहीं होगा। जो मिट्टी, बाताश, जल वगैरह पेड़ को महीरुह बनाती थी, वह सब अब नहीं रही। करीम साहब जैसे बड़ी माप के इन्सानों की भी अब पुनरावृत्ति नहीं होगी।।

About the writer

MAHASHWETA DEVI

MAHASHWETA DEVI बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म 1926 में ढाका में हुआ। वह वर्षों बिहार और बंगाल के घने कबाइली इलाकों में रही हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में इन क्षेत्रों के अनुभव को अत्यन्त प्रामाणिकता के साथ उभारा है।महाश्वेता देवी एक थीम से दूसरी थीम के बीच भटकती नहीं हैं। उनका विशिष्ट क्षेत्र है-दलितों और साधन-हीनों के हृदयहीन शोषण का चित्रण और इसी संदेश को वे बार-बार सही जगह पहुँचाना चाहती हैं ताकि अनन्त काल से गरीबी-रेखा से नीचे साँस लेनेवाली विराट मानवता के बारे में लोगों को सचेत कर सकें। गैर-व्यावसायिक पत्रों में छपने के बावजूद उनके पाठकों की संख्या बहुत बड़ी है। उन्हें साहित्य अकादेमी, ज्ञानपीठ पुरस्कार व मैग्सेसे पुरस्कार समेत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

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