BAGHAIR NAQSHE KA MAKAN

Original Book/Language: उर्दू भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित। अनुवादक - कैफ़ सिद्दीक़ी सुल्तानपुरी

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-548-1

Author:MUNAWWAR RANA

Translation:मुनव्वर राना को अपने क़द को नापने की अभी तक फ़ुर्सत ही नहीं मिली। उन्हें अपनी साहित्यिक उपलब्धियाँ गिनवाने का कभी ख़ब्त सवार नहीं हुआ। वह जानते हैं कि उनका लिखा हुआ उनके काम तो नहीं आया लेकिन साहित्य के काम हमेशा आता रहेगा। बहुत कम लोग इस बात से परिचित होंगे कि शायरी शुरू करने से पहले मुनव्वर राना कहानियाँ, अफ़साने और ड्रामे लिखते रहे हैं। उनके उस वक़्त के साथी उन्हें एक ड्रामानिगार की हैसियत से ही जानते थे। उनकी बहुत सी कहानियाँ और अफ़साने उस ज़माने में कलकत्ते के अख़बारों और उर्दू रिसालों में छपे भी। लेकिन कुछ नौजवान दोस्तों और शायरों की ज़िद पर उन्होंने गद्य का मैदान छोड़कर शायरी की तरफ़ तवज्जो देना शुरू कर दिया और उम्र का एक बड़ा हिस्सा काफ़िया और रदीफ़ की भूलभुलैया में गुज़ार दिया। मुनव्वर राना को यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि जो इज़्ज़तें और शोहरतें उन्हें हासिल हैं वह उनका नसीब है, उनकी शायरी का मेहनताना हरगिज़ नहीं। संस्मरणात्मक लेखों का यह संग्रह अपने आप में अद्भुत और पठनीय है।

Pages:182

MRP:Rs.300/-

Stock:In Stock

Rs.300/-

Details

उर्दू भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित। अनुवादक - कैफ़ सिद्दीक़ी सुल्तानपुरी

Additional Information

मुनव्वर राना को अपने क़द को नापने की अभी तक फ़ुर्सत ही नहीं मिली। उन्हें अपनी साहित्यिक उपलब्धियाँ गिनवाने का कभी ख़ब्त सवार नहीं हुआ। वह जानते हैं कि उनका लिखा हुआ उनके काम तो नहीं आया लेकिन साहित्य के काम हमेशा आता रहेगा। बहुत कम लोग इस बात से परिचित होंगे कि शायरी शुरू करने से पहले मुनव्वर राना कहानियाँ, अफ़साने और ड्रामे लिखते रहे हैं। उनके उस वक़्त के साथी उन्हें एक ड्रामानिगार की हैसियत से ही जानते थे। उनकी बहुत सी कहानियाँ और अफ़साने उस ज़माने में कलकत्ते के अख़बारों और उर्दू रिसालों में छपे भी। लेकिन कुछ नौजवान दोस्तों और शायरों की ज़िद पर उन्होंने गद्य का मैदान छोड़कर शायरी की तरफ़ तवज्जो देना शुरू कर दिया और उम्र का एक बड़ा हिस्सा काफ़िया और रदीफ़ की भूलभुलैया में गुज़ार दिया। मुनव्वर राना को यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि जो इज़्ज़तें और शोहरतें उन्हें हासिल हैं वह उनका नसीब है, उनकी शायरी का मेहनताना हरगिज़ नहीं। संस्मरणात्मक लेखों का यह संग्रह अपने आप में अद्भुत और पठनीय है।

About the writer

MUNAWWAR RANA

MUNAWWAR RANA मुनव्वर राना का जन्म 26 नवम्बर, 1952 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ था। सैयद मुनव्वर अली राना यूँ तो बी. कॉम. तक ही पढ़ पाये किन्तु ज़िन्दगी के हालात ने उन्हें ज्यादा पढ़ाया भी उन्होंने खूब पढ़ा भी। माँ, ग़ज़ल गाँव, पीपल छाँव, मोर पाँव, सब उसके लिए, बदन सराय, घर अकेला हो गया, मुहाजिरनामा, सुखन सराय, शहदाबा, सफ़ेद जंगली कबूतर, फुन्नक ताल, बग़ैर नक़्शे का मकान, ढलान से उतरते हुए और मुनव्वर राना की सौ ग़ज़लें हिन्दी व उर्दू में प्रकाशित हुईं। कई किताबों का बांग्ला व अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।

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