DHALAN SE UTARTE HUE

Original Book/Language: उर्दू भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित। अनुवादक - कैफ़ सिद्दीक़ी सुल्तानपुरी

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-550-4

Author:MUNAWWAR RANA

Translation:मुनव्वर राना की ज़िंदगी ने देखते ही देखते उम्र के साठवें ज़ीने पर पाँव रख दिये लेकिन उनकी इल्मी लियाक़त और अदबी सूझ-बूझ रायबरेली के शोएब विद्यालय के दर्जा पाँच के क्लास में बिछी टाट पट्टी पर ही बैठी रह गयी, उन्होंने ऐसा कुछ नहीं लिखा जिस पर उन्हें बेजा फ़ख्र हो, लेकिन हाँ! उन्होंने ऐसा भी कुछ नहीं किया कि उन्हें अपने किये पर शर्मिन्दगी महसूस हो। अदब तख़लीक़ करने का दावा उन्होंने कभी नहीं किया, क्योंकि उनकी कम इल्मी ने उनमें ऐसी किसी बीमारी को पनपने नहीं दिया जिसे गुरूर कहा जाता हो, उन्हें शेर कहने से ज़्यादा नस्र निगारी का शौक था, लेकिन वह इस खुद एतमादी से महरूम थे जिसे उर्फ़े आम में एहसासे बरतरी कहा जाता है।... लिहाज़ा इन संस्मरणात्मक लेखों के ज़रिये मुनव्वर राना अपने क़द्रदानों का शुक्रिया अदा करना अपना फ़र्ज़ समझते हैं।

Pages:176

MRP:Rs.300/-

Stock:In Stock

Rs.300/-

Details

उर्दू भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित। अनुवादक - कैफ़ सिद्दीक़ी सुल्तानपुरी

Additional Information

मुनव्वर राना की ज़िंदगी ने देखते ही देखते उम्र के साठवें ज़ीने पर पाँव रख दिये लेकिन उनकी इल्मी लियाक़त और अदबी सूझ-बूझ रायबरेली के शोएब विद्यालय के दर्जा पाँच के क्लास में बिछी टाट पट्टी पर ही बैठी रह गयी, उन्होंने ऐसा कुछ नहीं लिखा जिस पर उन्हें बेजा फ़ख्र हो, लेकिन हाँ! उन्होंने ऐसा भी कुछ नहीं किया कि उन्हें अपने किये पर शर्मिन्दगी महसूस हो। अदब तख़लीक़ करने का दावा उन्होंने कभी नहीं किया, क्योंकि उनकी कम इल्मी ने उनमें ऐसी किसी बीमारी को पनपने नहीं दिया जिसे गुरूर कहा जाता हो, उन्हें शेर कहने से ज़्यादा नस्र निगारी का शौक था, लेकिन वह इस खुद एतमादी से महरूम थे जिसे उर्फ़े आम में एहसासे बरतरी कहा जाता है।... लिहाज़ा इन संस्मरणात्मक लेखों के ज़रिये मुनव्वर राना अपने क़द्रदानों का शुक्रिया अदा करना अपना फ़र्ज़ समझते हैं।

About the writer

MUNAWWAR RANA

MUNAWWAR RANA मुनव्वर राना का जन्म 26 नवम्बर, 1952 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ था। सैयद मुनव्वर अली राना यूँ तो बी. कॉम. तक ही पढ़ पाये किन्तु ज़िन्दगी के हालात ने उन्हें ज्यादा पढ़ाया भी उन्होंने खूब पढ़ा भी। माँ, ग़ज़ल गाँव, पीपल छाँव, मोर पाँव, सब उसके लिए, बदन सराय, घर अकेला हो गया, मुहाजिरनामा, सुखन सराय, शहदाबा, सफ़ेद जंगली कबूतर, फुन्नक ताल, बग़ैर नक़्शे का मकान, ढलान से उतरते हुए और मुनव्वर राना की सौ ग़ज़लें हिन्दी व उर्दू में प्रकाशित हुईं। कई किताबों का बांग्ला व अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।

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