PHUNNAK TAAL

Original Book/Language: उर्दू भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित। अनुवादक - कैफ़ सिद्दीक़ी सुल्तानपुरी

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-546-7

Author:MUNAWWAR RANA

Translation:‘फुन्नक ताल’ मुनव्वर राना के इंशाइयों और ख़ाकों की ताज़ा तरीन किताब है। उनकी क़लम की रौशनाई और तहरीर दोनों की कँपकँपाहट चुग़लखोरी कर रही है लेकिन उनकी पेशानी पर उनके किरदार का नूर अभी तक मौजूद है क्योंकि उन्होंने अपनी क़लम से कभी बद दियानती नहीं की, अपनी तहरीरों से नाजाएज़ फ़ायदा नहीं उठाया। मुनव्वर राना ने यक़ीनन बहुत बड़ा अदब तख़लीक़ नहीं किया लेकिन जो कुछ लिखा, जितना लिखा वह पूरी ईमानदारी और ज़िम्मेदारी के साथ लिखा है। कहीं-कहीं पर उनकी क़लम बे राह रवी का शिकार हुई है, लेकिन अदब और समाज में बैठे हुए खराब लोगों को देखकर शायद उनसे यह जुर्म सरज़द हुआ हो क्योंकि बचपन से ही शायद नाइंसाफियों और ज़ालिमाना रविश से उन्हें नफरत रही है। यही सबब है कि उनकी शायरी में हुस्नो इश्क की कहानियाँ या शराब व शबाब के क़िस्से बिल्कुल नहीं हैं। उन्होंने अपनी क़लम को वही लिखने की इजाज़त दी, जिसे उनका ज़मीर कुबूल करता है। ‘फुन्नक ताल’ में संग्रहीत निबन्ध उनके अन्दर के उस नौजवान के देखे हुए ख़्वाब हैं, जिसकी आँखें आज तक ताबीर के इन्तिज़ार में भटक रही हैं।

Pages:128

MRP:Rs.300/-

Stock:In Stock

Rs.300/-

Details

उर्दू भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित। अनुवादक - कैफ़ सिद्दीक़ी सुल्तानपुरी

Additional Information

‘फुन्नक ताल’ मुनव्वर राना के इंशाइयों और ख़ाकों की ताज़ा तरीन किताब है। उनकी क़लम की रौशनाई और तहरीर दोनों की कँपकँपाहट चुग़लखोरी कर रही है लेकिन उनकी पेशानी पर उनके किरदार का नूर अभी तक मौजूद है क्योंकि उन्होंने अपनी क़लम से कभी बद दियानती नहीं की, अपनी तहरीरों से नाजाएज़ फ़ायदा नहीं उठाया। मुनव्वर राना ने यक़ीनन बहुत बड़ा अदब तख़लीक़ नहीं किया लेकिन जो कुछ लिखा, जितना लिखा वह पूरी ईमानदारी और ज़िम्मेदारी के साथ लिखा है। कहीं-कहीं पर उनकी क़लम बे राह रवी का शिकार हुई है, लेकिन अदब और समाज में बैठे हुए खराब लोगों को देखकर शायद उनसे यह जुर्म सरज़द हुआ हो क्योंकि बचपन से ही शायद नाइंसाफियों और ज़ालिमाना रविश से उन्हें नफरत रही है। यही सबब है कि उनकी शायरी में हुस्नो इश्क की कहानियाँ या शराब व शबाब के क़िस्से बिल्कुल नहीं हैं। उन्होंने अपनी क़लम को वही लिखने की इजाज़त दी, जिसे उनका ज़मीर कुबूल करता है। ‘फुन्नक ताल’ में संग्रहीत निबन्ध उनके अन्दर के उस नौजवान के देखे हुए ख़्वाब हैं, जिसकी आँखें आज तक ताबीर के इन्तिज़ार में भटक रही हैं।

About the writer

MUNAWWAR RANA

MUNAWWAR RANA मुनव्वर राना का जन्म 26 नवम्बर, 1952 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ था। सैयद मुनव्वर अली राना यूँ तो बी. कॉम. तक ही पढ़ पाये किन्तु ज़िन्दगी के हालात ने उन्हें ज्यादा पढ़ाया भी उन्होंने खूब पढ़ा भी। माँ, ग़ज़ल गाँव, पीपल छाँव, मोर पाँव, सब उसके लिए, बदन सराय, घर अकेला हो गया, मुहाजिरनामा, सुखन सराय, शहदाबा, सफ़ेद जंगली कबूतर, फुन्नक ताल, बग़ैर नक़्शे का मकान, ढलान से उतरते हुए और मुनव्वर राना की सौ ग़ज़लें हिन्दी व उर्दू में प्रकाशित हुईं। कई किताबों का बांग्ला व अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।

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