PACHAS KAVITAYEN - MAMTA KALIA

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-226-8

Author:MAMTA KALIA

Pages:72

MRP:Rs.65/-

Stock:In Stock

Rs.65/-

Details

नयी सदी के लिए चयन : पचास कविताएँ

Additional Information

ममता कालिया ने आज भले ही गद्य लेखन की विधाओं में अपना प्रमुख स्थान बना लिया हो, मूलतः वह कवयित्री हैं। उनकी रचना-यात्रा कविता से आरम्भ हुई थी और कविता की गत्यात्मकता उनके गद्य की उसी प्रकार विशिष्टता है जिस प्रकार निर्मल वर्मा अथवा अज्ञेय की। ममता कालिया का आन्तरिक विन्यास एक ऐसे कवि का है जिसके पास मुक्तिबोध जैसी बेचैनी और धूमिल जैसा अक्खड़पन कमोबेश मँडराता रहता है। प्रस्तुत कविताएँ ममता के जीवन, जगत और संघर्ष का दर्पण हैं। इनमें कालजयी, क्लासिक प्रश्नों की जगह वे समस्त वास्तविक जटिलताएँ हैं जिनसे व्यक्ति की चेतना प्रतिदिन, प्रतिपल रगड़ खाती रहती है। चिन्तन व्यक्ति का संघर्ष ज़्यादा मारक होता है क्योंकि वह दो धरातलों पर चलता है। उसके आगे प्रत्यक्ष और परोक्ष, प्रस्तुत एवं अप्रस्तुत, क्षणजीवी व चिरन्तन के दृश्य कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक आवेग-संवेग उपस्थित करते हैं। ममता की कविताएँ बहुत लम्बी नहीं होतीं, वे प्रत्यंचा सी तनी हुई, पाठक की चेतना पर असर डालती हैं। कवि के रचना-संसार में पुरुष, विरोधी अथवा ख़लनायक की तरह नहीं वरन् प्रेमी या पार्टनर की तरह आता है जिससे बराबर का हक़ माँगती स्त्री सतत संवाद की स्थिति में है। इन कविताओं में स्त्री-विमर्श अपनी पॉजिटिव शक्ति के साथ उभरता है। इन रचनाओं में गहरी संवेदना, मौलिक कल्पना, अचूक दृष्टि और बौद्धिक ऊर्जा तो है ही, साथ ही है जीवन के प्रति अनुरागमयी आत्मीयता और संघर्षधर्मिता। इनमें चुनौती और हस्तक्षेप, संवाद और विवाद तथा सोच और विचार सम्मिलित है। जगह-जगह परिवार के वर्चस्ववादी फ्रेम पर टिप्पणी है तो परस्पर सुख व प्रेम का स्वीकार भी है। जीवन को सीधे सम्बोधित ये रचनाएँ कवि की गहरी आस्था, विश्वास और अनुराग का दर्पण हैं।

About the writer

MAMTA KALIA

MAMTA KALIA "ममता कालिया कई शहरों में रहने, पढ़ने और पढ़ाने के बाद अब ममता कालिया दिल्ली (एनसीआर) में रहकर अध्ययन और लेखन करती हैं। वे हिन्दी और इंग्लिश दोनों भाषाओं की रचनाकार हैं। भारतीय समाज की विशेषताओं और विषमताओं पर अपनी पैनी नज़र रखते हुए ममता कालिया की प्रत्येक रचना के केन्द्र में आज का समाज है। विकासशील समाज में बनते-बिगड़ते सम्बन्ध, प्रगति के आर्थिक, सामाजिक दबाव, स्त्राी की प्रगति को देखकर पुरुष मनोविज्ञान की कुण्ठाएँ और कामकाजी स्त्राी के संघर्ष उनके प्रिय विषय हैं। प्रकाशित पुस्तकों की संख्या विपुल होने के कारण यहाँ केवल उनकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकों का उल्लेख किया जा रहा है। ममता कालिया ने कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, नाटक, यात्रा- साहित्य और निबन्धों से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है । प्रमुख उपन्यास: बेघर, नरक दर नरक, तीन लघु उपन्यास, दौड़, दुक्खम-सुक्खम, सपनों की होम डिलिवरी, कल्चर-वल्चर। प्रमुख कहानी संग्रह: छुटकारा, सीट नम्बर छह, उसका यौवन, एक अदद औरत, जाँच अभी जारी है, निर्मोही, मुखौटा, बोलने वाली औरत, थोड़ा सा प्रगतिशील, ख़ुशक़िस्मत। कविता संग्रह: । A Tribute to Papa and Other Poems (Writers Workshop), Poems 78 (Writers Workshop), खाँटी घरेलू औरत, पचास कविताएँं, कितने प्रश्न करूँ। संस्मरण: कल परसों के बरसों, कितने शहरों में कितनी बार। निबन्ध् संग्रह: भविष्य का स्त्राी विमर्श, स्त्राी विमर्श का यथार्थ। ममता कालिया ने अनेक कहानी संकलनों का सम्पादन किया है तथा 5 वर्ष महात्मा गाँधी हिन्दी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा की इंग्लिश पत्रिका भ्पदकप की सम्पादक रही हैं। उन्हें मिले पुरस्कारों और सम्मानों की सूची में कुछ इस प्रकार हैं: सर्वश्रेष्ठ कहानी सम्मान हिन्दुस्तान टाइम्स, दिल्ली; यशपाल कथा सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, राम मनोहर लोहिया सम्मान (उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा); वनमाली सम्मान, वाग्देवि सम्मान, सीता स्मृति सम्मान, कमलेश्वर स्मृति सम्मान, के. के. बिड़ला न्यास का व्यास सम्मान। सम्प्रति वे एक उपन्यास और संस्मरणमाला पर कार्य कर रही हैं। पता: बी 3ए/303, सुशान्त एक्वापोलिस, ओपोजिट क्रासिंग्स रिपब्लिक, ग़ाज़ियाबाद-201009 ई-मेल: mamtakalia011@gmail.com "

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