GOURAIYA KO TO GUSSA NAHIN AATA

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-987-8

Author:DAMODAR KHARSE

Pages:184

MRP:Rs.350/-

Stock:In Stock

Rs.350/-

Details

डॉ. दामोदर खड़से की कहानियाँ हमारे वास्तविक जीवन के निकट और इतनी स्वाभाविक होती हैं कि पाठक को कभी लगता ही नहीं कि वह किसी अनबूझ मानसिकता से जूझ रहा है। इन कहानियों से आज के सारे सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, घरेलू और घर-बाहर के सन्दर्भ बड़ी गहराई से जुड़े हैं। मनुष्य का मनुष्य के प्रति लगाव उनकी ‘जन्मान्तर गाथा’ नामक कहानी में देखा जा सकता है। इसमें परिवार के प्रति प्रेम और आस्था के बीच कर्तव्यपरायणता का बखूबी वर्णन है। ‘गन्ध’ नामक कहानी में ‘नॉशिया’ अर्थात् नफरत के कारण और प्रभाव का बड़ा सुन्दर वर्णन है। ‘मुहाने पर’ कहानी में एक मेहनतकश ग्रामीण के शहर आने और संघर्ष की कथा है। कहानी में लेखक ने पुलिस अत्याचार, अधिकारियों के दुर्व्यवहार, गुंडों द्वारा शोषण और ठेलेवालों के संघर्ष का मार्मिक चित्राण किया है। ‘फिरौती’, ‘साहब फिर कब आयेंगे माँ!’ ऐसी ही स्थितियों की कहानियाँ हैं। ‘गौरैया को तो गुस्सा नहीं आता’ मनोवैज्ञानिक धरातल पर लिखी कहानी है। डॉ. दामोदर खड़से की भाषा सरल किन्तु छाप छोड़ने वाली है। घटनाक्रम और वातावरण, स्थान का चित्राण वे खूबी से करते हैं। पाठक को लगता है कि वे पढ़ नहीं रहे हैं, सब कुछ घटित होता हुआ देख रहे हैं। वह सारे परिवेश का एक हिस्सा है। पाठक चाहता है कि लेखक उसे समझे, उसे आन्तरिक तृप्ति और अपने लेखन से शान्ति प्रदान करे। वह शाब्दिक भूल-भुलैया में भटकना नहीं चाहता। पाठक मानसिक रूप से उन रोड़ों को पार करने का मार्ग चाहता है, जो उसके मार्ग में हैं। उसकी शास्त्रीय ऋण-धन में रुचि नहीं होती। मेरा विश्वास है कि डॉ. दामोदर खड़से उन प्रतिभाओं में से हैं, जिनके कृतित्व में मध्यवर्गीय जीवन के सुख-दुखों की सुगन्ध है और पाठक उनके कथा-संसार में रमकर आत्मसन्तोष और सुख प्राप्त कर लेगा। हरिनारायण व्यास (‘दूसरा सप्तक’ के कवि)

Additional Information

...ऋचा का ध्यान पूरी तरह अलमारी के उ$पर ही होता। अंडे कब फूटे पता नहीं। उसमें से दो नन्ही-नन्ही गौरैया टकटकी लगाये, चोंच फैलाये चीं...चीं...करती रहतीं। बड़ी गौरैया, बच्चों के लिए कीड़े-मकोड़े, कभी अनाज का दाना लेकर आती। ऋचा की आँखों की चमक का उस दिन कोई ठिकाना न था, जिस दिन वह हमेशा की तरह कुर्सी पर तकिये लगा रही थी। उसने भीतर झाँका ही था कि गौरैया का बच्चा फुर्र से उड़कर पंखे पर जा बैठा। ऋचा ने जोरदार तालियाँ बजायीं। इतने में बेल बजी। शायद पापा आये हैं। उसकी इच्छा हुई कि खोखे में छिप जाये। पर उसने बेडरूम का दरवाजा भीतर से बन्द कर दिया। ऊपर देखा तो दूसरा बच्चा भी अलमारी के कोने से ऋचा को देख रहा था। सरला ने बाहर से आवाज दी। बड़ी मुश्किल से ऋचा ने दरवाजा खोला। जयन्त ने कहा, ”बेटे, इन्हें और कुछ दिन रहने दो ऊपर। नहीं तो दूसरे गौरैया इसे मार डालेंगे। “ ऋचा को अपने पापा पर भरोसा नहीं आ रहा था। फिर भी माँ के पीछे खड़ी रही। इतने में पंखे पर बैठी नन्ही गौरैया डगमगा गयी और जयन्त ने उसे हौले से थाम लिया। ऋचा पल भर को चीखी, पर पापा ने कहा कि इसे घोंसले में रख देंगे। ऋचा की आँखों से लगा कि वह छूना चाहती हो। तब तक जयन्त ने अपना हाथ ऋचा तक बढ़ा दिया। ऋचा ने छुआ और जयन्त ने उसे फिर अलमारी के ऊपर बिठा दिया।

About the writer

DAMODAR KHARSE

DAMODAR KHARSE सम्मान : केन्द्रीय साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली द्वारा ‘बारोमास' के लिए अकादेमी पुरस्कार (अनुवाद)-2015, महाराष्ट्र भारती अखिल भारतीय हिन्दी सेवा सम्मान-2016 (महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी) साथ ही, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा; उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, भोपाल; महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी, प्रियदर्शनी, मुम्बई; नयी धारा, पटना; अपनी भाषा, कोलकाता; गुरुकुल, पुणे; केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, नयी दिल्ली आदि संस्थानों द्वारा सम्मानित।। राइटर-इन-रेजीडेंस : महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में ‘राइटर-इन-रेजीडेंस' के रूप में नियुक्त। विदेश-यात्रा : संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, नेपाल, थाईलैंड। कार्यकारी अध्यक्ष : महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी (2011-2015)। सदस्य : केन्द्रीय हिन्दी समिति (अध्यक्ष : प्रधान मन्त्री, भारत सरकार) सहित कई मन्त्रालयों की हिन्दी सलाहकार समिति व विश्वविद्यालयों के बोर्ड ऑफ स्टडीज पर सदस्य के रूप में कार्य। रचनाओं का मराठी, अंग्रेज़ी, कन्नड़, गुजराती, पंजाबी, सिन्धी, राजस्थानी आदि भाषा में अनुवाद। सम्प्रति : स्वतन्त्र लेखन।

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