KONCH KI RAMLEELA

Format:

ISBN:978-93-5229-094-9

Author:AYODHYA PRASAD GUPT 'KUMUD'

Pages:202

MRP:Rs.600/-

Stock:In Stock

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कोंच कस्बे में होने वाली रामलीला चलायमान होती है। लीला में लंका दहन से लेकर लक्ष्मण मेघनाद युद्ध, राम रावण युद्ध सहित सभी लीलाएं चलायमान दिखाई जाती हैं। लीला का मंचन करने के लिए देश के नामी कलाकार कोंच में आते हैं। कस्बे की रामलीला का इतिहास भी पुराना है। यहां की रामलीला के चर्चे दूर दूर के जनपदों तक सुनने को मिलते हैं। इसी प्रसिद्धि के चलते कोंच की रामलीला को एशिया में सर्वोच्च माना गया है। इसमें राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न का अभिनय मात्र ब्राह्मण जाति के बालक कर सकते हैं और उन्हें जब तक रामलीला चलती है, परिवार से विलग होकर रामलीला समिति के संरक्षण में कई मर्यादाओं की प्रतिज्ञा में बंधकर रहना पड़ता है। रामलीला के लिए आज तक किसी सरकारी या अर्द्ध सरकारी संस्था से कोई सहायता नहीं ली गई। नगर के लोग ही घर-घर राम, सीता, लक्ष्मण के पहुंचने पर उनके तिलक स्वरूप और आरती उतारते हुए जो न्यौछावर देते हैं उसी से सारी व्यवस्थाओं का संचालन होता है। मुस्लिम नागरिक भी इसमें अर्पण कर सद्भाव की मशाल जलाने में पीछे नहीं रहते। यहां किसी कलाकार को बाहर से बुलाने की परम्परा नहीं है न ही किसी पात्र को कोई पारिश्रमिक दिया जाता है। यहां तक कि मुस्लिम कारीगर, जो कि कई प्रसंगों में पुतले बनाने के अलावा धनुष-वाण तैयार करने में भूमिका निभाते हैं, वे भी कोई मेहनताना नहीं लेते। रामलीला के लिए हर कोई श्रद्धा और पूजा भाव से अपनी सेवा समर्पित करता है।

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AYODHYA PRASAD GUPT ''KUMUD''

AYODHYA PRASAD GUPT ''KUMUD'' अयोध्या प्रसाद गुप्त ‘कुमुद’ ओजस्वी कवि-वक्ता, भारतीय संस्कृति, पत्राकारिता तथा लोककथाओं के सशक्त हस्ताक्षर ‘कुमुद’ बुन्देलखण्ड के सक्षम सन्दर्भ व्यक्ति हैं। 15.07.1944 को कोंच (जालौन, उ.प्र.) में जन्म। उनकी लगभग दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं। लगभग आधा दर्जन पुस्तकें, प्रकाशन हेतु अनुबन्धित/प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं। डेढ़ दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान उन्हें प्राप्त हुए हैं। बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा ‘‘अयोध्या प्रसाद गुप्त ‘कुमुद’: व्यक्ति और साहित्य’’ विषय पर (एक शोध छात्रा डॉ. रणविजय सिंह चौहान को) पीएच. डी. उपाधि प्रदान की गयी है। श्री कुमुद की रचनाएँ विभिन्न शिक्षा बोर्डों यथाµसी.बी.एस.ई./सी.सी.ई. द्वारा स्वीकृत हिन्दी विषय की पाठ्य-पुस्तकों में सम्मिलित हैं। लगभग पाँच दशक से जागरूक पत्राकार के रूप में मीडिया से जुड़े रहे हैं, जिनमें दैनिक जागरण, कानपुर तथा न्छप्/यूनीवार्ता संवाद समिति प्रमुख हैं। प्रबन्धन, व्यक्तित्व विकास प्रशिक्षण, रंगमंच, सक्रिय समाजसेवा आदि उनकी बहुआयामी क्रियाशीलता के कुछ आयाम हैं। श्रीराम वनगमन-पथ शोध-सृजन यात्रा समिति (मध्य प्रदेश शासन) के सदस्य के रूप में दुर्गम-वन-प्रान्तर की यात्रा करके सांस्कृतिक-सन्धान के सहयोगी बनने का श्रेय भी उन्हें प्राप्त रहा है। भारत सरकार, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश राज्यों के संस्कृति विभाग की अनेक समितियों में रहे हैं। प्रकाशित कृतियाँ: जगनिक, मूलचन्द्र अग्रवाल-कृष्णानन्द गुप्त, मैथिलीशरण गुप्त: पचास कविताएँ, साहित्यिक-श्राद्ध, कहावतों में लोकनीति, बुन्देलखण्ड में मेला, यात्रा और उत्सव, लोकस्मृति में बुन्देलखण्ड के इतिहास प्रसंग, मध्य प्रदेश के मेले और तीज-त्योहार, जालौन जनपद की ऐतिहासिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, सुरम्य बुन्देलखण्ड, बुन्देलखण्ड की काव्यात्मक कहावतें, सांस्कृतिक बुन्देलखण्ड, भारतीय लोककलाओं के विविध आयाम, बुन्देलखण्ड की फागें, लोक-संस्कृति, बुन्देलखण्ड का लोकजीवन, सप्तदल, जालौन जनपद, साहित्य-मंजूषा आदि। पुरस्कार: सीनियर फेलोशिप, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय फेलोशिप, हैनरी गिसेनबियर फेलोशिप, बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय: विशिष्ट सम्मान, विद्या भास्कर पुरस्कार, लोकभूषण सम्मान, सोनचिरैया लोककला सम्मान, अकादमी पुरस्कार, पं. रामनरेश त्रिपाठी पुरस्कार, भारतीय हिन्दी परिषद (इलाहाबाद) सम्मान, सेठ गोविन्द दास सम्मान, साकेत सम्मान, बुन्देलखण्ड गौरव सम्मान, माधवराव सप्रे संग्रहालय सम्मान, राव बहादुर सिंह बुन्देला स्मृति सम्मान, साधक सम्मान, संस्कार भारती सम्मान (2001), लोककला रत्न।

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