BICHCHHOO PHOOPHEE

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5000-963-5

Author:ISMAT CHUGHATAI

Pages:96

MRP:Rs.150/-

Stock:In Stock

Rs.150/-

Details

फूफी बादशाही बावजूद बालों के वही मुन्नी सी बिच्छू लग रही थीं, जो बचपन में भाइयों से मचल-मचल कर बात मनवा लिया करती थीं। उनकी शेर जैसी खुर्राट आँखें एक मेमने की मासूम आँखों की तरह सहमी हुई थीं। बड़े-बड़े आँसू उनकी संगमरमर की चट्टान जैसे गालों पर बह रहे थे। “हमें कोसो बिच्छू बी।” अब्बा ने प्यार से कहा। मेरी अम्मा ने सिसकते हुए बादशाही खानम से कोसने की भीख माँगी। या अल्लाह... या अल्लाह... उन्होंने गरजना चाहा। मगर काँप कर रह गयीं “या... या अल्लाह... मेरी उम्र मेरे भैया को देदे... या मौला... अपने रसूल का सदक़ा..." वह उस बच्चे की तरह झुँझलाकर रो पड़ीं जिसे सबक़ याद न हो। सब के मुँह सफेद हो गये। अम्मा के पैरों का दम निकल गया। या ख़ुदा आज बिच्छू फूफी के मुँह से भाई के लिए एक कोसना न निकला। केवल अब्बा मियाँ मुस्कुरा रहे थे जैसे उनके कोसने सुनकर मुस्कुरा दिया करते थे। सच है बहन के कोसने भाई को नहीं लगते। वह माँ के दूध में डूबे हुए होते हैं।

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About the writer

ISMAT CHUGHATAI

ISMAT CHUGHATAI इस्मत चुगताई (1912-1992) उर्दू कथा साहित्य में अपनी बेबाक अभिव्यक्ति के लिए अलग से जानी जाती हैं। उनकी कृतियों में मानवीय करुणा और सक्रिय प्रतिरोध का दुर्लभ सामंजस्य है जिसकी बिना पर उनकी सर्जनात्मक प्रतिमा की एक विशिष्ट पहचान बनती है। इस्मत चुगताई शुरुआत से ही प्रगतिशील साहित्यांदोलन से जुडी रहीं और जब जरूरत हुई, उन्होंने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया लेकिन कभी खुद को तरक्की पसन्द कहलाने का आग्रह नहीं किया। आन्दोलन के पहले उभार के दौरान प्रगतिशील लेखकों के उर्दू मुख-पत्र ‘नया अदब’ में प्रकाशित उनकी कहानियों के जरिए प्रगतिशील कथालेखन का एक नया रुजहान सामने आया। उन्होंने प्रगतिशील कथा-आलोचना के प्रतिमानों के सामने चुनौती खड़ी कर दी।

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