HIMALAYA KA KABRISTAN

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5229-373-5

Author:LAXMI PRASAD PANT

Pages:204

MRP:Rs.495/-

Stock:In Stock

Rs.495/-

Details

हिमालय का कब्रिस्तान

Additional Information

हिमालय के साथ दिक़्क़त यह है कि हमारे उसे देखने के नज़रिये में या तो ख़ूबसूरती है या गहरी देव-तुल्य आस्था। अफ़सोस यह है कि सरकारों की मानवीय नीतियाँ भी यहीं से शुरू होती हैं और ख़त्म भी यहीं हो जाती हैं। यही नज़रिया दुर्भाग्यपूर्ण है। हिमालय हमें जाने क्यों देवदूत दिखता है! मानो ईश्वर से संवाद का रास्ता यहीं से गुज़रकर जाता है। विडम्बना देखिए, हम एक ओर हिमालय की जड़ें खोद रहे हैं तो दूसरी ओर जब कोई पत्थर गिरता है तो उसे हम दैवी आपदा का नाम दे देते हैं। चाहे वो भूकम्प हो या भूस्खलन। ऊपर से ये घोर बाज़ारवादी मानसिकता, जिसने हिमालय की हर चोटी, हर सम्पदा पर प्राइस टैग लगा दिया है। हिमालय के पानी तक को हमने बोतलबन्द कर दिया है, बस डिब्बाबन्द हिमालय आने का इन्तज़ार बाकी है। गौर से देखें तो रंगीन तस्वीरों, फिष्ल्मी दृश्यों में हिमालय हमेशा मुस्कराता दिखता है। धरती का सबसे सुन्दर ठिकाना भी यही लगता है। आप जब भी इन दृश्यों को देखते हैं तो एक नयी अनुभूति भी पाते हैं। लेकिन, जाने क्यों हमारे कल्पना-लोक में हिमालय की निशानदेही फ़िल्मी दृश्यों की ख़ूबसूरत लोकेशनों से आगे नहीं बढ़ पाती है। एक फ़िल्म, कुछ तस्वीरें और कैरियरवादी वाइल्डलाइफ़ या नेचुरल-फ़ोटोग्राफर जो देखते हैं या हमें दिखाने के लिए अपने कैमरों में दर्ज़ कर ले जाते हैं वही हिमालय का सच नहीं है। न हिमालय पोलर बियर के फर से बना कोई टैडी बियर है। मौजूदा कानूनों, नियमों और नीतियों से टूटता-बिखरता, सड़ता-गलता हिमालय न हमें दिखता है और न ही दिखाया जाता है। संक्षेप में, हिमालय की याद तभी आती है जब मई-जून की गर्म हवाएँ किसी गाँव-शहर की सरहद में दाख़िल होकर हमें तड़पा देने की हद तक तपा देती हैं। पहाड़ों को लेकर हमारा रुझान बच्चों की छुट्टियों तक सीमित है। आश्चर्य होता है, हिमालय हमारे लिए इन तात्कालिक ज़रूरतों से ज़्यादा कुछ नहीं है। और मान भी लें कि हिमालय को पहचानने का हमारा हुनर यही है, लेकिन फिर सोचिए वैसा हिमालय आपको कैसा लगेगा जिसमें न बर्फ़ हो, न बादल हों और न हरियाली। केदारनाथ की तबाही, कश्मीर का जलजला और नेपाल का भूकम्प यही संकेत दे रहे हैं और हम सब तबाही की एक और नयी तारीख़ का इन्तज़ार कर रहे हैं।

About the writer

LAXMI PRASAD PANT

LAXMI PRASAD PANT उत्तराखंड का बेहद ख़ूबसूरत ज़िला है चमोली। इसी ज़िले के पिलंग गाँव से पैदाइश, परवरिश और पहचान जुड़ी है। डीयू में पढ़ाई फिर पत्राकारिता में पीजी, जिज्ञासाएँ पेशा बनीं तो हो गये पत्रकार। पहाड़ में पैदाइश इसलिए प्रकृति और पर्यावरण पर झुकाव। इसलिए पत्राकारिता में इसी विषय पर सबसे ज़्यादा काम। शुरुआत प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘कथादेश’ में उप-सम्पादक के तौर पर की। ‘दैनिक जागरण’, ‘अमर उजाला’ और फिलवक़्त ‘दैनिक भास्कर’ में स्टेट एडिटर, राजस्थान रहते हुए कश्मीर, उत्तराखंड, नेपाल सहित हिमालयी राज्यों की जमकर रिपोर्टिंग। एवरेस्ट के बेस कैम्प तक जाकर बदलते पर्यावरण पर की गयी रिपोर्टिंग जो हिन्दी अख़बारों में पहली बार हुई। इसलिए पूरे देश में सराही गयी। 2004 में ‘दैनिक जागरण’ में रहते यह बता दिया था कि कुछ अनिष्ट होने वाला है केदारनाथ में। किस रास्ते से होगा, कितनी तबाही और भीषणता, इसका भी दस्तावेज़ी दावा। स्वभाव ऐसा कि प्रकृति से जुड़ी कोई हलचल नज़रअन्दाज़ नहीं होती, तेवर ये कि किसी को नज़रअन्दाज़ करने भी नहीं दे सकते। यही प्रकृति प्रेम अब पहचान बनता जा रहा है जो अच्छा लगता है।

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