Nayee Sadi Kee Kavita

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5229-505-0

Author:Ganesh Pandey

Pages:152

MRP:Rs.295/-

Stock:Out of Stock

Rs.295/-

Details

नयी सदी की कविता

Additional Information

नयी सदी की कविता’ कवि, कथाकार, आलोचक गणेश पाण्डेय की आलोचना की नयी किताब है। पाठक अनुभव करेंगे कि गणेश पाण्डेय की आलोचना न सिर्फ एक रचना है, बल्कि उसमें भी आलोचक के व्यक्तित्व की गहरी छाप है। एक खास तरह की निजता इनकी आलोचना की पहचान है। गणेश पाण्डेय अपनी किताब ‘नयी सदी की कविता’ में न सिर्फ नयी सदी की कविता का एक मुकम्मल चेहरा पाठकों के सामने उपस्थित करते हैं, बल्कि बीती सदी की आखिरी चौथाई की कविता के परिसर से नयी सदी की कविता और कवि के स्वभाव में फर्क को खासतौर से रेखांकित करते हैं। उन तत्वों और प्रवृत्तियों की ओर इशारा करते हैं जो बीती सदी की कविता में ठहराव की वजह हैं। कविता के परिसर में छायी कवि और आलोचक के व्यक्तित्व की उस धुंध को भी साफ करते हैं, जिससे मुक्त होकर नयी सदी की कविता अपने चेहरे के साथ आगे बढ़ती है, जिसमें किसी पूर्ववर्ती कवि का चेहरा या नकल नहीं है। यह जानने की कोशिश की गयी है कि नयी सदी की कविता कैसे कविता को कविता के इलाके में ले जाने का जरूरी काम करती है। इस दौर का कवि भी पहली नजर में नाम-इनाम की तीव्र एषणा से मुक्त दिखता है। यह किताब नयी सदी की कविता की प्रवृत्तियों पर तो विचार करती ही है, कवि और आलोचक को कविता और आलोचना की कसौटी पर परखती भी है। इन्हीं अर्थों में गणेश पाण्डेय की आलोचना को समकालीन आलोचना का प्रतिपक्ष कहते हैं। जिसमें एक ओर हमारे समय की आलोचना और कविता के जर्जर केन्द्रों का प्रतिरोध है तो दूसरी ओर न्याय पर आधारित आलोचना और कविता के नये केन्द्रों की निर्मिति के लिए सम्भावनाओं की खोज है। निश्चय ही यह किताब हमारे समय की कविता की धारा के समक्ष एक जरूरी हस्तक्षेप है। कवि की तरह ही आलोचक भी अपना मुहावरा खुद गढ़ता है। जाहिर है कि गणेश पाण्डेय अपनी आलोचना का मुहावरा खुद बनाते हैं। तथ्यों के विश्लेषण में ही नहीं, उनके वर्णन में भी आलोचना की नयी सर्जनात्मक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। पाठक अनुभव करेंगे कि गणेश पाण्डेय हमारे समय की निर्जीव आलोचना को किस तरह नया करने का काम करते हैं।

About the writer

Ganesh Pandey

Ganesh Pandey सनद के मुताबिक 13 जुलाई 1955 को तेतरी बाजार, सिद्धार्थनगर (तत्कालीन जनपद बस्ती) में जन्म। आरम्भिक शिक्षा वहीं और आसपास। किशोर जीवन से ही साहित्य में गहरी दिलचस्पी। उच्चशिक्षा के लिए गोरखपुर आगमन। गोरखपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. की उपाधि हासिल और यहीं से ‘आठवें दशक की हिन्दी कहानी में ग्रामीण जीवन’ विषय पर डॉक्टरेट। जीविका की शुरुआत में कुछ वक्त पत्राकारिता से सम्बद्ध। कुछ समय उद्योग विभाग में सहायक प्रबन्धक के रूप में सरकारी नौकरी। सन् 1987 में गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति, तब से यहीं। सम्प्रति प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। विश्वविद्यालय में पूर्व अधिष्ठाता छात्राकल्याण और शिक्षक राजनीति में लोकतान्त्रिाक मूल्यों के लिए लम्बे संघर्ष के फलस्वरूप यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में भी योगदान। साहित्यिक पत्रिका ‘यात्रा’ का सम्पादन। इंटरनेट पर ब्लॉग। प्रकाशित कृतियाँ: अटा पड़ा था दुख का हाट, जल में, जापानी बुखार, परिणीता (कविता संग्रह); अथ ऊदल कथा, रीफ (उपन्यास); पीली पत्तियाँ (कहानी संग्रह); रचना, आलोचना और पत्राकारिता, आलोचना का सच (आलोचना); आठवें दशक की हिन्दी कहानी (शोध)।

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