Stri, Parampara Aur Aadhunikta

Format:Paper Back

ISBN:978-81-7055-643-5

Author:RAJ KISHORE

Pages:168

MRP:Rs.95/-

Stock:In Stock

Rs.95/-

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स्त्री, परंपरा और आधुनिकता

Additional Information

आधुनिकता जब पुरुषों में आती है तब वह उतने विवाद का विषय नहीं बनती जितनी तब जब स्त्रियाँ उसके प्रति आकर्षित होने लगती हैं। स्त्रियों से आशा की जाती है कि वे परंपरा का वाहक बनेंगी, अपनी परंपरागत भूमिकाओं से संतुष्ट रहेंगी तथा पुरुषों के लिए चुनौती नहीं बनेंगी। लेकिन संस्कृति का कोई भी पट-परिवर्तन किसी भी एक वर्ग तक सीमित कैसे रह सकता है? जब नयी सामाजिक धाराओं का अभ्युदय होता है, तो ब्रेश्त के शब्दों में कहा जा सकता है कि हर शै बदलती है। लेकिन हर बदलाव क्या बेहतर ही होता है? क्या हमें परिवर्तन को आलोचनात्मक विवेक के साथ नहीं स्वीकार करना चाहिए? इसी से यह सवाल भी पैदा होता है कि क्या आधुनिकता का अर्थ पश्चिम का अंधानुकरण है? निश्चय ही पश्चिमी सभ्यता ने वहाँ के स्त्री-पुरुषों को उन्मुक्त किया है तथा सभी पूर्वाग्रहों के आगे प्रश्नचिह्न लगाये हैं। लेकिन वहाँ के जीवन में लालसा का जो अबाधित नृत्य है, हिंसा के जो रूप हैं और, सबसे बढ़कर, सामाजिकता का जो क्षय है, उसे देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि एक आदर्श संस्कृति हासिल कर ली गयी है। यही कारण है कि उस संस्कृति को अपनाने के दबाव में भारत जैसे समाजों में आधुनिकता की जो धारा विकसित हुई है उसने जितनी समस्याओं का समाधान किया है, उससे कहीं ज्यादा समस्याएँ पैदा की हैं। इसका प्रभाव स्त्री के जीवन पर भी पड़ा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय स्त्री का परंपरागत जीवन आदर्श था। उसमें खलल पड़ना जरूरी था, लेकिन आधुनिकता ने यह काम किस तरह से किया है, उससे कई महत्त्वपूर्ण प्रश्नचिह्न पैदा होते हैं। यह पुस्तक इन्हीं प्रश्नचिह्नों से एक रचनात्मक टकराव है।

About the writer

RAJ KISHORE

RAJ KISHORE राजकिशोर 2 जनवरी 1947 को कलकत्ता में जन्म। शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), एलएल.बी. तथा बी. कॉम. (ऑनस)। पत्रकारिता की शुरुआत अगस्त 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'रविवार' से। 1986-87 में साप्ताहिक 'परिवर्तन' का संपादन किया। 1987 से 1990 तक 'रविवार' के संयुक्त संपादक। 1990 से 1996 तक नवभारत टाइम्स, दिल्ली में वरिष्ठ सहायक संपादक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। मुख्यतः राजनीति, समाज एवं आर्थिक विषयों पर लेखन। संप्रति प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' के संयुक्त संपादक। अन्य प्रकाशन : पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य, आजादी एक अधूरा शब्द है, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति, हिन्दी लेखक और उसका समाज, जाति कौन तोड़ेगा तथा तुम्हारा सुख (उपन्यास)। संपादन : समकालीन पत्रकारिता : मूल्यांकन और मुद्दे। सह-संपादन : मुसलमान क्या सोचते हैं। लोकप्रिय पुस्तक श्रृंखला ‘आज के प्रश्न' के संपादक, जिसके अंतर्गत अब तक 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पुरस्कार और सम्मान : पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1988 में लोहिया पुरस्कार, 1990 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान तथा 1995 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार। 1996 में मध्य प्रदेश सरकार की राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता फेलोशिप।

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