Jayasi Granthawali

Format:Paper Back

ISBN:जायसी ग्रन्थावली

Author:AACHARYA RAMCHANDRA SHUKLA

Pages:516

MRP:Rs.250/-

Stock:In Stock

Rs.250/-

Details

जायसी ग्रन्थावली

Additional Information

इस प्राचीन मनोहर ग्रंथ का कोई अच्छा संस्करण अब तक न था और हिंदी प्रेमियों की रुचि अपने साहित्य के सम्यक् अध्ययन की ओर दिन-दिन बढ़ रही थी। आठ-नौ वर्ष हए, काशी नागरीप्रचारिणी सभा ने अपनी 'मनोरंजन पुस्तकमाला' के लिए मुझसे 'पदमावत' का एक संक्षिप्त संस्करण शब्दार्थ और टिप्पणी सहित तैयार करने के लिए कहा था। मैंने आधे के लगभग ग्रंथ तैयार भी किया था। पर पीछे यह निश्चय हुआ कि जायसी के दोनों ग्रंथ पूरे-पूरे निकाले जाएँ। अतः 'पदमावत' की वह अधूरी तैयार की हुई कॉपी बहुत दिनों तक पड़ी रही। इधर जब विश्वविद्यालयों में हिंदी का प्रवेश हआ और हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य भी परीक्षा के वैकल्पिक विषयों में रखा गया, तब तो जायसी का एक शुद्ध उत्तम संस्करण निकालना अनिवार्य हो गया क्योंकि बी. ए. और एम. ए. दोनों की परीक्षाओं में पदमावत रखी गई। पढ़ाई प्रारंभ हो चुकी थी और पुस्तक के बिना हर्ज हो रहा था; इससे यह निश्चय किया गया कि समग्र ग्रंथ एकबारगी निकालने में देर होगी; अत: उसके छह-छह फार्म के खंड करके निकाले जायँ जिससे छात्रों का काम भी चलता रहे। कार्तिक संवत् 1980 से इन खंडों का निकलना प्रारंभ हो गया। चार खंडों में 'पदमावत' और 'अखरावट' दोनों पुस्तकें समाप्त हुईं। 'पदमावत' की चार छपी प्रतियों के अतिरिक्त मेरे पास कैथी लिपि में लिखी एक हस्तलिखित प्रति भी थी जिससे पाठ के निश्चय करने में कुछ सहायता मिली। पाठ के संबंध में यह कह देना आवश्यक है कि वह अवधी व्याकरण और उच्चारण तथा भाषाविकास के अनुसार रखा गया है।

About the writer

AACHARYA RAMCHANDRA SHUKLA

AACHARYA RAMCHANDRA SHUKLA आचार्य रामचन्द्र शुक्ल शुक्लजी का जन्म बस्ती जिले के अगोना गाँव में सन् 1884 में हुआ था और निधन सन् 1941 में। आत्मसम्मान, सहजता, प्रकृति प्रेम तथा गण-दोष की विवेचना शक्ति आदि गण उनके व्यक्तित्व का महत्त्वपर्ण हिस्सा थे। शुक्लजी के सम्पादक जीवन की शुरुआत विद्यार्थी जीवन में ही बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' की 'आनन्द कादम्बिनी' में कार्य करते हए हुई। कुछ समय के लिए उन्होंने 'काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का सम्पादन भी किया। प्रारम्भ में उन्होंने दो-तीन नाटक-प्रहसन लिखे। 'भारत में वसन्त' और 'मनोहर छटा' कविताएँ भी लिखीं। उनकी प्रमुख कतियाँ इस प्रकार हैं-इतिहास-'हिन्दी साहित्य का इतिहास': आलोचना-'जायसी', 'तलसीदास', 'सूरदास', रस मीमांसा': निबन्ध-'चिन्तामणि भाग-1, भाग-2: कविता-'मध स्त्रोत': सम्पादन- 'भ्रमरगीत सार', 'जायसी ग्रन्थावली', 'वीर सिंहदेव चरित', 'भारतेन्दु संग्रह', 'विश्व प्रपंच', 'आदर्श जीवन', 'कल्पना का आनन्द'। रामचन्द्र शुक्ल ने निबन्धों को बौद्धिक धरातल और समालोचना को सामाजिक व मनौवैज्ञानिक आधार दिया। विचारों के क्षेत्र में उन्होंने लोक सिद्धान्त और लोक भावना को नहीं भुलाया। इसीलिए साहित्य को मनोरंजन की परिधि से निकालकर गम्भीर व व्यापक दायित्वोध से जोड़ा। वस्तुतः आचार्य शुक्ल ने आधुनिक हिन्दी गद्य को जो विशिष्टता, व्यापकता, उदात्तता और मजबूती दी है, हिन्दी संसार उसके लिए सदैव ऋणी रहेगा। वे अपनी उपमा स्वयं हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही कहा था- 'हिन्दी संसार में शक्लजी अपने ढंग का एक और अद्वितीय व्यक्तित्व लेकर अवतीर्ण हुए थे।'

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