HINDI SAHITYA KA ITIHAS

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-807-9

Author:AACHARYA RAMCHANDRA SHUKLA

Pages:572

MRP:Rs.160/-

Stock:In Stock

Rs.160/-

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हिन्दी साहित्य का इतिहास

Additional Information

हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन को यदि आरम्भिक, मध्य व आधुनिक काल में विभाजित कर विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यन्त विस्तृत व प्राचीन है। हिन्दी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में प्रचलित धारणाओं पर विचार करते समय हमारे सामने हिन्दी भाषा की उत्पत्ति का प्रश्न दसवीं शताब्दी के आसपास की प्राकृताभास भाषा तथा अपभ्रंश भाषाओं की ओर जाता है। अपभ्रंश शब्द की व्युत्पत्ति और जैन रचनाकारों की अपभ्रंश कृतियों का हिन्दी से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए जो तर्क और प्रमाण हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में प्रस्तुत किये गये हैं उन पर विचार करना भी आवश्यक है। सामान्यतः प्राकृत की अन्तिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव स्वीकार किया जाता है। उस समय अपभ्रंश के कई रूप थे और उनमें सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही पद्य रचना प्रारम्भ हो गयी थी। साहित्य की दृष्टि से पद्यबद्ध जो रचनाएँ मिलती हैं वे दोहा रूप में ही हैं और उनके विषय, धर्म, नीति, उपदेश आदि प्रमुख हैं। राजाश्रित कवि और चारण नीति, श्रृंगार, शौर्य, पराक्रम आदि के वर्णन से अपनी साहित्य-रुचि का परिचय दिया करते थे। यह रचना-परम्परा आगे चलकर शौरसेनी अपभ्रंश या प्राकृताभास हिन्दी में कई वर्षों तक चलती रही। पुरानी अपभ्रंश भाषा और बोलचाल की देशी भाषा का प्रयोग निरन्तर बढ़ता गया। इस भाषा को विद्यापति ने देसी भाषा कहा है, किन्तु यह निर्णय करना सरल नहीं है कि हिन्दी शब्द का प्रयोग इस भाषा के लिए कब और किस देश में प्रारम्भ हुआ। हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि प्रारम्भ में हिन्दी शब्द का प्रयोग विदेशी मुसलमानों ने किया था। इस शब्द से उनका तात्पर्य भारतीय भाषा का था।

About the writer

AACHARYA RAMCHANDRA SHUKLA

AACHARYA RAMCHANDRA SHUKLA आचार्य रामचन्द्र शुक्ल शुक्लजी का जन्म बस्ती जिले के अगोना गाँव में सन् 1884 में हुआ था और निधन सन् 1941 में। आत्मसम्मान, सहजता, प्रकृति प्रेम तथा गण-दोष की विवेचना शक्ति आदि गण उनके व्यक्तित्व का महत्त्वपर्ण हिस्सा थे। शुक्लजी के सम्पादक जीवन की शुरुआत विद्यार्थी जीवन में ही बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' की 'आनन्द कादम्बिनी' में कार्य करते हए हुई। कुछ समय के लिए उन्होंने 'काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का सम्पादन भी किया। प्रारम्भ में उन्होंने दो-तीन नाटक-प्रहसन लिखे। 'भारत में वसन्त' और 'मनोहर छटा' कविताएँ भी लिखीं। उनकी प्रमुख कतियाँ इस प्रकार हैं-इतिहास-'हिन्दी साहित्य का इतिहास': आलोचना-'जायसी', 'तलसीदास', 'सूरदास', रस मीमांसा': निबन्ध-'चिन्तामणि भाग-1, भाग-2: कविता-'मध स्त्रोत': सम्पादन- 'भ्रमरगीत सार', 'जायसी ग्रन्थावली', 'वीर सिंहदेव चरित', 'भारतेन्दु संग्रह', 'विश्व प्रपंच', 'आदर्श जीवन', 'कल्पना का आनन्द'। रामचन्द्र शुक्ल ने निबन्धों को बौद्धिक धरातल और समालोचना को सामाजिक व मनौवैज्ञानिक आधार दिया। विचारों के क्षेत्र में उन्होंने लोक सिद्धान्त और लोक भावना को नहीं भुलाया। इसीलिए साहित्य को मनोरंजन की परिधि से निकालकर गम्भीर व व्यापक दायित्वोध से जोड़ा। वस्तुतः आचार्य शुक्ल ने आधुनिक हिन्दी गद्य को जो विशिष्टता, व्यापकता, उदात्तता और मजबूती दी है, हिन्दी संसार उसके लिए सदैव ऋणी रहेगा। वे अपनी उपमा स्वयं हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही कहा था- 'हिन्दी संसार में शक्लजी अपने ढंग का एक और अद्वितीय व्यक्तित्व लेकर अवतीर्ण हुए थे।'

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