Harijan Se Dalit

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-672-3

Author:RAJ KISHORE

Pages:176

MRP:Rs.200/-

Stock:In Stock

Rs.200/-

Details

हरिजन से दलित

Additional Information

'हरिजन' एक सुन्दर शब्द है। इस पर गाँधी जी के व्यक्तित्व की मिठास की छाप है। लेकिन आज कोई गाँधी नहीं है। अतः 'हरिजन' शब्द का अर्थ भी तिरोहित हो चुका है। गाँधी जी भी नहीं चाहते होंगे कि कोई हरिजन आजीवन हरिजन ही बना रहे। गाँधी के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त करने पर कांग्रेस के लोगों और गाँधीवादियों को तकलीफ़ होती है, किन्तु समाज में कोई हरिजन न रह जाए, इसके लिए उन्होंने किया क्या है? वस्तुतः यह आक्रोश गाँधी के प्रति कम, गाँधी के अनुयायियों के प्रति ज़्यादा है। जब कोई दलित गुस्से में आता है तो, वह सवर्ण समाज के सभी मिथकों और देवी-देवताओं को ध्वस्त कर देना चाहता है। यदि भारत का सवर्ण गाँधी को सिर्फ़ अपना देवता नहीं मानता, बल्कि मौजूदा अन्धकार में प्रकाश स्तम्भ समझता है, तो उसे हरिजनों को ऊपर लाने के लिए जी-जान से कूद पड़ना चाहिए। प्रेम की परीक्षा कर्म से ही होती है। वैसे भी समाज के किसी खास वर्ग के लिए कोई स्थायी नामकरण नहीं होना चाहिए। इस दृष्टि से हरिजन और दलित, दोनों निरर्थक शब्द हैं। हरिजन प्रेम और दलित संघर्ष दोनों की श्रेष्ठ परिणति यही होगी कि ये शब्द हमारे कोश से क्रमशः बाहर होते जाएँ। जाति प्रथा बनानेवालों ने सोचा होगा कि वे कुछ शाश्वत कोटियों की रचना कर रहे हैं। उन्हें सम्पूर्ण रूप से पराजित करने से बड़ा सामाजिक सुख इस समय भारत में क्या हो सकता है?

About the writer

RAJ KISHORE

RAJ KISHORE राजकिशोर 2 जनवरी 1947 को कलकत्ता में जन्म। शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), एलएल.बी. तथा बी. कॉम. (ऑनस)। पत्रकारिता की शुरुआत अगस्त 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'रविवार' से। 1986-87 में साप्ताहिक 'परिवर्तन' का संपादन किया। 1987 से 1990 तक 'रविवार' के संयुक्त संपादक। 1990 से 1996 तक नवभारत टाइम्स, दिल्ली में वरिष्ठ सहायक संपादक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। मुख्यतः राजनीति, समाज एवं आर्थिक विषयों पर लेखन। संप्रति प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' के संयुक्त संपादक। अन्य प्रकाशन : पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य, आजादी एक अधूरा शब्द है, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति, हिन्दी लेखक और उसका समाज, जाति कौन तोड़ेगा तथा तुम्हारा सुख (उपन्यास)। संपादन : समकालीन पत्रकारिता : मूल्यांकन और मुद्दे। सह-संपादन : मुसलमान क्या सोचते हैं। लोकप्रिय पुस्तक श्रृंखला ‘आज के प्रश्न' के संपादक, जिसके अंतर्गत अब तक 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पुरस्कार और सम्मान : पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1988 में लोहिया पुरस्कार, 1990 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान तथा 1995 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार। 1996 में मध्य प्रदेश सरकार की राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता फेलोशिप।

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