Media Ki Bhasha-Leela

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-835-2

Author:Ravikant

Pages:180

MRP:Rs.395/-

Stock:In Stock

Rs.395/-

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Additional Information

यह पुस्तक जन-माध्यम के आर-पार अध्ययन कि एक दलील है, चूंकि उनकी परस्पर निर्भरता ऐतिहासिक तौर पर लाजिमी साबित होती है। यह सही है कि राष्ट्र के बदलते भूगोल के सैट-साथ संस्कृति को देखने-परखने के नजरिये में बदलाव आते हैं, लेकिन आधुनिक मीडिया-तकनीक और बाज़ार लोकप्रिय संस्कृतियों कि आवाजाही के ऐसे साधन मुहैया करतते हैं, जिन पर राष्ट्रीय भूगोल कि फ़ौरी संकीर्णता हावी नहीं हो पाती। साहित्य-आधारित सिनेमा पर बातें करने कि रिवायत पुरानी है, लेकिन यह देखने का वक़्त आ गया है कि सिनेमा ने साहित्य कि शैली, उसकी भाषा पर कौन से असरात छोड़े हैं। यह पुस्तक आपको कई नये पहलुओं से अवगत कराएगी।

About the writer

Ravikant

Ravikant इतिहासकार, लेखक और अनुवादक, दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहासकार पढऩे-पढ़ाने के बाद सन् 2000 से सीएसडीएस में; सेंटर के सराय और भारतीय भाषा कार्यक्रम से नज़दीकी जुड़ाव. सह-संपादित पुस्तकें : ट्रांस्लेटिंग पार्टीशन (तरुण सेंट के साथ; कथा, 2001), दीवान-ए-सराय 01 : मीडिया विमर्श//हिंदी जनपद (2002) और दीवान-ए-सराय 02 : शहरनामा (2005, संजय शर्मा के साथ, वाणी प्रकाशन). प्रतिमान, कथादेश, लोकमत समाचार, और नया पथ जैसी पत्र-पत्रिकाओं में छपे हालिया लेख गद्यकोश,काफ़िला, जानकी पुल, रचनाकार, एकेडेमिया. इडूीयू आदि वेबसाइटों पर मौजूद.

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