Shor Ke Viruddh Srajan (Mamata Kaliya Ka Rachna Sansar)

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-86799-17-3

Author:Edited by Jitendra Srivastava

Pages:247

MRP:Rs.795/-

Stock:In Stock

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Details

‘शोर के विरुद्ध सृजन’ लेखिका ममता कालिया द्वारा लिखित कहानियों, उपन्यासों, कविता व संस्मरणों का अनेक साहित्यकारों द्वारा किया गया आलोचनात्मक अध्ययन है। ममता कालिया की सम्पूर्ण कृतियाँ स्त्री समस्याओं के इर्द-गिर्द घूमती हैं। उनकी कहानियों में स्त्री-पुरुष सम्बन्ध और पारिवारिक मूल्य केन्द्रीय तत्त्व की तरह उपस्थित हैं। स्त्री-पुरुष के जीवन का ऐसा सामंजस्य जिसमें स्त्री और पुरुष एक-दूसरे को ठीक से समझते हैं और व्यवहार के स्तर पर जहाँ किसी भी प्रकार की गैर-बराबरी के लिए जगह न हो। उनकी कहानियों में स्त्री और पुरुष के बीच बने रिश्ते का रसायन समाज को अग्रगामी बनाता है। यह भरोसे का संसार निर्मित करने वाले स्त्री-पुरुष की कहानियाँ हैं; उनकी नहीं, जो पुरुषों को मालिक और स्त्री को दास बना बैठे या यह कि विवाह और परिवार अन्ततः विनाशकारी प्रवृत्तियों से भरी हुई एक रोगग्रस्त संस्था है। बिना किसी शोर के अपनी कहानियों से सार्थक हस्तक्षेप करना ममता कालिया के कहानीकार का मूल स्वभाव है। कहानियों के साथ ही साथ ममता कालिया उपन्यास की भी कुशल शिल्पकार हैं। ‘दुक्खम-सुक्खम’ में उन्होंने पूर्ण चातुर्य का परिचय दिया है। इसकी कहानी किसी विशेष परिवार की कहानी न होकर भारतीय समाज की कहानी है। भाषा की शब्दावली, मुहावरे, लोकोक्तियों का प्रयोग लोकजीवन को और भी चटख रंग प्रदान करता है। ममता की बोल्ड, बेबाक और बेझिझक भाषा न केवल समस्यागत यथार्थ के सुधरेपन से पाठक को रूबरू कराती है वरन् ज़िन्दगी की रूढ़ियों और चुके हुए आदर्शों पर रोचक शैली में आक्रमण भी करती है। अपने संस्मरणों में ममता कालिया शहर का ऐेसा सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं कि भारतीय सृजनात्मक साहित्य में प्रायः दुर्लभ है। हिन्दी साहित्य में ममता कालिया की पहचान भले ही उपन्यासकार-कथाकार के रूप में हो लेकिन उन्होंने अपना साहित्यिक सफ़र कविता से प्रारम्भ किया। घरेलू औरतों पर कहानियाँ-उपन्यास तो अवश्य लिखे गये किन्तु कविताओं के ताने-बाने ने इस वर्ग के स्त्री यथार्थ को सम्भवतः पहली बार व्यापक संवेदना और कथ्य के साथ ममता कालिया ने उद्घाटित किया है।

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