Kissa Paune Char Yar

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5229-614-9

Author:MANOHAR SHYAM JOSHI

Pages:80

MRP:Rs.225/-

Stock:In Stock

Rs.225/-

Details

क़िस्सा पौने चार यार

Additional Information

मनोहर श्याम जोशी भाषिक भंगिमाओं को बहुत दूर तक खींचने में सक्षम हैं यह निर्विवाद सत्य है जिसके चलते अनेक जगह प्रान्तीय हिन्दियों का संगम-सा रचना में उपस्थित हो जाता है। यह आंचलिकता सचेष्ट है -प्रत्येक पात्र किसी अलग ‘अंचल’ को बता सकने के उद्देश्य से चुना गया लगता है ताकि उसकी बोली-बानी अलग दिखाई-सुनाई दे। उपन्यास की कहानी के केन्द्र में विस्थापितों के शहर दिल्ली में सरकारी क्वार्टरों में रहने वाली एक नसीब की मारी लड़की है और उसके साढ़े तीन प्रेमी हैं जो देश के अलग-अलग हिस्सों से रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली आये हैं। पहला प्रेमी एक कंगला किशोर है जो अल्मोड़ा से दसवीं पास कर के अपने मामा के यहाँ आया हुआ है, दूसरा एक बंगाली है जो किसी अफ़सर का असिस्टेंट है और चालू-छलिया है। तीसरे एक अधेड़ तोंदियल हैं, जो करते क्या हैं यह किसी को नहीं पता लेकिन उनके पास चमचमाती नयी कार है। बोलने के लहज़े से लगता है कि पंजाबी हैं। साढ़े तीनवाँ प्रेमी उसके घर में उप-किरायेदार है और हमेशा कुछ पढ़ता रहता है जिससे ऐसा लगता है कि वह इंटैलैक्चुअल है। इसके अलावा लेखक है जो पत्रकार की हैसियत से साहित्य लिख रहा है। अल्मोड़ा वाले का बयान कुमाऊँनी हिन्दी में है, बंगाली बाबू का बयान बंगाली हिन्दी में और तीसरे प्रेमी का बयान पंजाबी में है। हिन्दी को अलग-अलग शैलियों में किस तरह बोला जा सकता है, बोला जाता है, इसकी तलाश उन्होंने ‘क़िस्सा पौने चार यार’ से शुरू की। ऐसी कहानी जिसमें कई-कई कहानियाँ गुँथी हुई हों, अनेक पात्र हों, वाचिक भाषा की अलग-अलग शैलियाँ हों, हास्य-व्यंग्य के साथ करुणा-विडम्बना का बोध हो। कहानियों को कड़ीबद्ध रूप में कहा जा सकता है-यह पहली बार मनोहर श्याम जोशी के लेखन में ही दिखाई देता है। वह अपने समय से बहुत आगे के लेखक थे।

About the writer

MANOHAR SHYAM JOSHI

MANOHAR SHYAM JOSHI मनोहर श्याम जोशी 9 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्रा जीवन से ही लेखक और पत्राकार बन गये। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आषीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21वें वर्श से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गये। प्रेस, रेडियो, टी.वी., वष्त्तचित्रा, फिल्म, विज्ञापन-सम्प्रेशण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विशय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया है। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्श के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्श के होने आये। केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतन्त्रा लेखन करते रहे । निधन: 30 मार्च 2006।

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