Mahanagari Ke Nayak

Format:Hard Bound

ISBN:9789352296286

Author:MANOHAR SHYAM JOSHI

Pages:144

MRP:Rs.395/-

Stock:In Stock

Rs.395/-

Details

महानगरी के नायक

Additional Information

'महानगरी के नायक’ में मनोहर श्याम जोशी जी के पात्र कोई प्रसिद्धि प्राप्त, आसमान को छूती हुई बुलन्दियों वाले केवल नायक ही नहीं बल्कि गन्दी हाफ पैण्ट-कमीज पहने, त्यौरियों पर आक्रोश और आँतों में अलसर धारण किए हुए, दर्जनों ट्रे एक साथ उठाये कैण्टीन से दफ़्तर और दफ़्तर से कैण्टीन जाता हुआ रंजन है। रेसकोर्स में घोड़ों की रेस खेलता ओमप्रकाश है, बाल काटने वाला नाई है, रेस्तराँ वाला शमशेर इत्यादि पात्र हैं, लेकिन उनके चेहरे पे चेहरा है। दिन में इतनी मेहनत करने वाला रंजन साँझ के रचे हुए होंठ, चिकन का कुर्ता, बढ़िया लट्ठे का पाजामा, जयपुरी पगड़ी में नज़र आयेगा, जो कि संगीत का विद्यार्थी व पारखी है। संस्कृति और भारतीयता के नाम पर भी दो प्रकार के नायक हैं। एक वे, जो विदेशों की चमक-दमक से प्रभावित होकर देश छोड़ने के पक्षधर हैं, दूसरे अध्यात्म रूप में समृद्ध भारत तथा शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ अंग्रेज़ी के कायल और कुछ हिन्दी के पाद पखारने में विश्वास रखने वाले। या यूँ कहिए जवानी को आधुनिकता प्यारी है और बुढ़ापा अपनी प्राचीन धरोहर को लेकर रोता है। मनोहर श्याम जोशी अपनी अनूठी शैली में किसी पात्र की अपने शब्दों से जो तस्वीर पेश करते हैं वो पाठक की आँखों में ही नहीं दिल में उतर जाती है। लच्छेदार भाषा व्यक्तित्व का दर्पण दिखाती है। अनेक हस्तियों से साक्षात्कार लेने के पश्चात् बातचीत को इतने सुन्दर व प्रभावशाली लहजे में कहने का गुर मनोहर श्याम जोशी जैसे महान साहित्यकार के अलावा किसमें हो सकता है। वास्तव में यह पुस्तक शब्दों के आईने में चेहरे दिखाती है।

About the writer

MANOHAR SHYAM JOSHI

MANOHAR SHYAM JOSHI मनोहर श्याम जोशी 9 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्रा जीवन से ही लेखक और पत्राकार बन गये। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आषीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21वें वर्श से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गये। प्रेस, रेडियो, टी.वी., वष्त्तचित्रा, फिल्म, विज्ञापन-सम्प्रेशण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विशय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया है। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्श के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्श के होने आये। केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतन्त्रा लेखन करते रहे । निधन: 30 मार्च 2006।

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