GANDHI : SAMAY, SAMAJ AUR SANSKRITI

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ISBN:81-7055-747-X

Author:VISHNU PRABHAKAR

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MRP:Rs.200/-

Stock:In Stock

Rs.200/-

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भारत विश्व में सबसे बड़ा प्रजातन्त्र माना जाता है। सफलताएँ तो इन पचास वर्षों में हमने विज्ञान, टेक्नालॉजी, आर्थिक और सामाजिक आदि अनेक क्षेत्रों में भी पायीं। उस सबका विस्तार से वर्णन करना आवश्यक नहीं है। आवश्यकता इस बात की पड़ताल करने की है, कि क्या हम इन सफलताओं के बाद भी एक सुगठित राष्ट्र के रूप में विश्व में एक ‘शक्ति’ बन सके? क्या आजादी के दीवानों ने, उन दीवानों ने, जिन्होंने हँसते-हँसते अपने प्राणों का विसर्जन कर दिया, भले ही उनका मार्ग कुछ भी क्यों न रहा हो, पर लक्ष्य उन सबका ‘एक’ था क्या उन्होंने जो स्वप्न देखा था वह पूरा हुआ? बलिदान की भावना उन सबमें एक समान थी। वे सब अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीना जानते थे और जीते भी थे। क्या हमने उनके इस गुण का सम्मान किया? क्या आज का भारत उनकी उन आशाओं और आकांक्षाओं का वह चित्र उपस्थित करता है, जो उनके मन में था? उनके ही मन में नहीं, बल्कि जन-जन के मन में था। आज का जो परिदृश्य है, उसे देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता, कि इस देश में कभी तिलक, गाँधी, सुभाष और आजाद जैसे अनेकानेक व्यक्ति भी हुए, जिन्होंने आजादी के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाकर अपने निष्काम कार्यों से विश्व को चकित कर दिया। ऐसे में हमें भगवान बुद्ध के वे शब्द याद आते हैं, ‘आप दीपो भव’ अपना दीपक आप बनो। जब ऐसा होगा, तभी हम सच्चे समाज का निर्माण कर सकेेंगे। समाज आखिर व्यक्तियों का समूह ही है। हम यहाँ कोई समाधान प्रस्तुत कर हरे हैं, बस व्यक्ति से आत्ममंथन करने की कह रहे हैं। मुक्ति का एक मार्ग ‘आत्ममंथन’ है, ‘अपना दीपक आप बनना’ है और दूसरे के लिए जीने का वास्तविक अर्थ-समझना है, पंचायत राज का वास्तविक अर्थ यही तो है और यही है गाँधी मार्ग।

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VISHNU PRABHAKAR

VISHNU PRABHAKAR अपने साहित्य में भारतीय वाग्मिता और अस्मिता को व्यंजित करने के लिये प्रसिद्ध रहे श्री विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून सन् 1912 को मीरापुर, ज़िला मुज़फ़्फ़रनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनकी शिक्षा-दीक्षा पंजाब में हुई। उन्होंने सन् 1929 में चंदूलाल एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल, हिसार से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तत्पश्चात् नौकरी करते हुए पंजाब विश्वविद्यालय से भूषण, प्राज्ञ, विशारद, प्रभाकर आदि की हिंदी-संस्कृत परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से ही बी.ए. भी किया। विष्णु प्रभाकर जी ने कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, निबंध, एकांकी, यात्रा-वृत्तांत और कविता आदि प्रमुख विधाओं में लगभग सौ कृतियाँ हिंदी को दीं। उनकी ‘आवारा मसीहा’ सर्वाधिक चर्चित जीवनी है, जिस पर उन्हें ‘पाब्लो नेरूदा सम्मान’, ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ सदृश अनेक देशी-विदेशी पुरस्कार मिले। प्रसिद्ध नाटक ‘सत्ता के आर-पार’ पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’ मिला तथा हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वार ‘शलाका सम्मान’ भी। उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के ‘गांधी पुरस्कार’ तथा राजभाषा विभाग, बिहार के ‘डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया। विष्णु प्रव्हाकर जी आकाशवाणी, दूरदर्शन, पत्र-पत्रिकाओं तथा प्रकाशन संबंधी मीडिया के विविध क्षेत्रों में पर्याप्त लोकप्रिय रहे। देश-विदेश की अनेक यात्राएँ करने वाले विष्णु जी जीवन पर्यंत पूर्णकालिक मसिजीवी रचनाकार के रूप में साहित्य-साधनारत रहे। 11 अप्रैल सन् 2009 को दिल्ली में विष्णु जी इस संसार से विदा ले गये।

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