Sur Banjaran

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-87409-38-5

Author:Bhagwandass Morwal

Pages:336

MRP:Rs.695/-

Stock:In Stock

Rs.695/-

Details

सुर बंजारन हिन्दी के देशज और लोक-मानस की अनुकृतियों को उकेरने वाले कथाकार भगवानदास मोरवाल की छठी औपन्यासिक कृति है। यह उपन्यास लगभग मरणासन्न और विलुप्त होती लोक-कला का दस्तावेज़ भर नहीं है, बल्कि एक अलक्षित और गुम होती विरासत का सांस्कृतिक इतिहास भी है। इसे हिन्दी का पहला ऐसा उपन्यास कहा जा सकता है जिसके आख्यान के केन्द्र में हाथरस शैली की नौटंकी, उसकी पूरी परम्परा और सुरों की समाप्त प्रायः दुनिया है। एक ऐसी दुनिया जिसने अपना वृत्त, लोक में प्रचलित श्रुतियों, ऐतिहासिक-सामाजिक घटना-परिघटनाओं पर आधारित लोक-धुनों व सुरों से निर्मित किया है। भारतीय इतिहास के सबसे अभागे राजकुमारों में से एक शाहज़ादे दारा शिकोह के बसाये एक छोटे-से शहर की, एक छोटी-सी गली से निकला यह कमसिन सुर जहाँ हिन्दुस्तान थिएटर में तप कर नौटंकी की दुनिया में अपनी गायन-क्षमता प्रमाणित करता है, वहीं अपनी उम्र के आख़िरी पड़ाव में आकर अभिव्यक्ति के सन्तोष में डूब, विडम्बनाओं के बीच यह अपने आप को नितान्त अकेला छोड़ देता है। पारम्परिक और आधुनिक गीत-संगीत व उनके साज़ों से छिड़े सुरों की लोक-परम्परा का अद्भुत मिश्रण है यह उपन्यास। इसकी नायिका रागिनी केवल एक पात्र नहीं है बल्कि ऐसे असंख्य अलक्षित सुरों का प्रतिनिधि-चरित्र है, जो आज गुमनामी के अँधेरे में खोए अपने-अपने सुरों के मीड़, गमक, खटका को तलाश रहे हैं। चौबोला, दौड़, दोहा, बहरतबील, दादरा, ठुमरी, छन्द, लावनी, बहरशिकस्त, सोहनी जैसे छन्द जब-जब ढोलक की थाप और झील-नक्काड़े की धमक पर गले को चीरते हुए रात के सन्नाटे में गूँजते हैं, तब लगता है मानो नटराज के दरबार में रागों की बारिश हो रही है। इसलिए इसे हाथरस शैली की नौटंकी की एक अदाकारा का जीवन-वृत्त कहना भी बेमानी होगा, बल्कि यह लोक से संचित विरासत की एक प्रबल अदम्यता और जिजीविषा का लोमहर्षक आख्यान के रूप में हमारे सामने आता है। यह उपन्यास नौटंकी के रूप में स्थापित हो चुकी उस विडम्बना का भी करुणामयी पाठ प्रस्तुत करता है, जिसने हमारे समाज में एक हिकारत और उपहास भरा मुहावरा गढ़ लिया है। एक ऐसा मुहावरा जिसने मान्य छन्दों की खनक को बदरंग कर दिया है। अपनी प्रखर संवेदना, पहले उपन्यासों की तरह रंगीन क़िस्सागोई और अपनी बेधक भाषा के लिए सर्वमान्य कथाकार भगवानदास मोरवाल की यह कृति एक अनूठी उपलब्धि है। अनूठी इसलिए कि नौटंकी अर्थात सांगीत को केन्द्र में रखकर आख्यान रचना एक चुनौती भरा काम है। मगर इस चुनौती और जोखिम की परवाह किये बिना लेखक इस आख्यान को अपनी परिणति तक पहुँचाने में बखूबी कामयाब रहा है। एक अलक्षित और उपेक्षित लोक-कला में समाहित जीवन की ओर लौटते हुए, इसके बहुविध रूपों और भाव-प्रवाह को लेखक ने, न केवल समृद्ध किया है अपितु इससे पाठक व हमारा साहित्य दोनों समृद्ध होंगे-ऐसा विश्वास है।

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About the writer

Bhagwandass Morwal

Bhagwandass Morwal जन्म : 23 जनवरी, 1960, नगीना, जिला मेवात (हरियाणा)। शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी) एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा। कृतियाँ : उपन्यास : काला पहाड़ (1999), बाबल तेरा देस में (2004), रेत (2008 तथा 2010 में उर्दू में अनुवाद), नरक मसीहा (2014)। कहानी संग्रह : सिला हुआ आदमी (1986), सूर्यास्त से पहले (1990), अस्सी मॉडल उ$र्फ सूबेदार (1994), सीढ़ियाँ, माँ और उसका देवता (2008), लक्ष्मण-रेखा (2010), दस प्रतिनिधि कहानियाँ (2014)। कविता संग्रह : दोपहरी चुप है (1990)। अन्य : कलयुगी पंचायत (बच्चों के लिए -1997), हिन्दी की श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ, सम्पादन (1987), इक्कीस श्रेष्ठ कहानियाँ, सम्पादन (1988)। सम्मान/पुरस्कार : 'श्रवण सहाय एवार्ड’ (2012); 'जनकवि मेहरसिंह सम्मान’ (2010), हरियाणा साहित्य अकादमी; 'अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान’ (2009) कथा (यूके) लन्दन; 'शब्द साधक ज्यूरी सम्मान’ (2009); 'कथाक्रम सम्मान’ (2006) लखनऊ; 'साहित्यकार सम्मान’ (2004) हिन्दी अकादमी, दिल्ली; 'साहित्यिक कृति सम्मान’ (1999) हिन्दी अकादमी, दिल्ली; 'साहित्यिक कृति सम्मान’ (1994) हिन्दी अकादमी, दिल्ली; पूर्व राष्ट्रपति श्री आर. वेंकटरमण द्वारा मद्रास का 'राजाजी सम्मान’ (1995); 'डॉ. अम्बेडकर सम्मान’ (1985) भारतीय दलित साहित्य अकादमी; पत्रकारिता के लिए 'प्रभादत्त मेमोरियल एवार्ड’ (1985); पत्रकारिता के लिए 'शोभना एवार्ड’ (1984)। जनवरी 2008 में ट्यूरिन (इटली) में आयोजित भारतीय लेखक सम्मेलन में शिरकत। पूर्व सदस्य, हिन्दी अकादमी (दिल्ली) एवं हरियाणा साहित्य अकादमी। सम्प्रति : उपनिदेशक, केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली। सम्पर्क : WZ-745G, दादा देव रोड, नज़दीक बाटा चौक, पालम, नई दिल्ली-110045 Email : bdmorval@gmail.com

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