Satta Ka Satya

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-876485-1-7

Author:Mukesh Bhardwaj

Pages:208

MRP:Rs.495/-

Stock:In Stock

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Mukesh Bhardwaj

Mukesh Bhardwaj मुकेश भारद्वाज नब्बे के दशक का वह दौर जब नागरिक की पहचान उपभोक्ता के रूप में हो रही थी और राष्ट्र राज्य एक बड़ा बाज़ार बन रहा था तब बतौर एक पत्रकार सत्ता के शीर्ष से लेकर हाशिए पर बैठे अन्तिम आदमी तक संवाद का मौका मिला। सत्ता का शीर्ष हाशिए को कैसे देखता है और हाशिए पर पड़े की सत्ता से क्या उम्मीद है, इसी को समझने और लिखने का इंडियन एक्सप्रेस समूह ने मौका दिया। इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता में काम करने का एक सुकून यह रहा कि नौकरी और जुनून दोनों में ख़ास फ़र्क नहीं रहा। 1988 में जनसत्ता में बतौर ट्रेनी शुरुआत, फिर इंडियन एक्सप्रेस के लिए पत्रकारिता और 2006 में जनसत्ता चण्डीगढ़ का स्थानीय सम्पादक बनने की कड़ी में अंग्रेजी के साथ हिन्दी में भी काम करने का मौका मिला। हिन्दी में काम करने की शुरुआत ने हाशिए पर से सत्ता को समझने का नया नज़रिया दिया। यह सच है कि जब आप जनता की भाषा में पत्रकारिता करते हैं तो उस समाज और संस्कृति को लेकर तमीज़दार होते हैं जिसका आप हिस्सा हैं। अनुभव यही रहा कि पत्रकारिता एक ऐसी विधा है जिसमें आप जब तक विद्यार्थी बने रहेंगे ज़िन्दा रहेंगे और इसमें मास्टरी होने की ख़ुशफ़हमी ही आपको इससे बेदखल कर देगी। पिछले कुछ समय से समाज और राजनीति के नये ककहरे से जूझने की जद्दोजहद जारी है। आज संचार माध्यमों का सर्वव्यापीकरण हो चुका है। कुछ भी स्थानीय और स्थायी नहीं रह गया है। भूगोल और संस्कृति पर राजनीति हावी है। एक तरफ़ राज्य का संस्थागत ढाँचा बाज़ार के खम्भों पर नया-नया की चीख़ मचाये हुए है तो चेतना के स्तर पर नया मनुष्य पुराना होने की ज़िद पाले बैठा है। जनसत्ता के कार्यकारी सम्पादक और पत्रकार होने के नाते 2014 के बाद की दिल्ली और देश को जितना सीखा और समझा वह संकलित होकर चार किताबें सत्ता की नज़र, सत्ता का सत्य, नोटबन्दी : नकद नारायण कथा और सत्ता से संवाद के रूप में आ चुकी हैं।

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