TEESARI TAALI

Format:Paper Back

ISBN:978-93-87889-17-0

Author:PRADEEP SAURABH

Pages:194

MRP:Rs.195/-

Stock:In Stock

Rs.195/-

Details

तीसरी ताली

Additional Information

यह उभयलिंगी सामाजिक दुनिया के बीच और बरक्स हिज़ड़ों, लौंडों, लौंडेबाजों, लेस्बियनों और विकृत-प्रकृति की ऐसी दुनिया है जो हर शहर में मौजूद है और समाज के हाशिए पर जिन्दगी जीती रहती है। अलीगढ़ से लेकर आरा, बलिया, छपरा, देवरिया यानी 'एबीसीडी' तक, दिल्ली से लेकर पूरे भारत में फैली यह दुनिया समान्तर जीवन जीती है। प्रदीप सौरभ ने इस दुनिया के उस तहखाने में झाँका है, जिसका अस्तित्व सब ‘मानते' तो हैं लेकिन 'जानते' नहीं। समकालीन 'बहुसांस्कृतिक' दौर के 'गे', 'लेस्बियन', 'ट्रांसजेंडर' अप्राकृत-यौनात्मक जीवन शैलियों के सीमित सांस्कृतिक स्वीकार में भी यह दुनिया अप्रिय, अकाम्य, अवांछित और वर्जित दुनिया है। यहाँ जितने चरित्र आते हैं वे सब नपुंसकत्व या परलिंगी या अप्राकृत यौन वाले ही हैं। परिवार परित्यक्त, समाज बहिष्कत-दंडित ये 'जन' भी किसी तरह जीते हैं। असामान्य लिंगी होने के साथ ही समाज के हाशियों पर धकेल दिये गये, इनकी सबसे बड़ी समस्या आजीविका है जो इन्हें अन्ततः इनके समुदायों में ले जाती है। इनका वर्जित लिंगी होने का अकेलापन 'ऐक्स्ट्रा' है और वही इनकी जिन्दगी का निर्णायक तत्त्व है। अकेले-अकेले बहिष्कृत ये किन्नर आर्थिक रूप से भी हाशिये पर डाल दिये जाते हैं। कल्चरल तरीके से 'फिक्स' दिए जाते हैं। यह जीवनशैली की लिंगीयता है जिसमें स्त्री लिंगी-पुलिंगी मुख्यधाराएँ हैं जो इनको दबा देती हैं। नपंसकलिंगी कहाँ कैसे जिएंगे? समाज का सहज स्वीकृत हिस्सा कब बनेंगे? फरटिदार पाठ देता 'मुन्नी मोबाइल' के बाद प्रदीप सौरभ का यह दूसरा उपन्यास 'तीसरी ताली' लेखक की जबर्दस्त पर्यवेक्षण-क्षमता का सबूत है। यहाँ वर्जित समाज की फीली कहानी है, जिसमें इस दुनिया का शब्दकोश जीवित हो उठा है। लेखक की गहरी हमदर्दी इस ज़िन्दगी के अयाचित दुखों और अकेलेपन की तरफ़ है। इस दुनिया को पढ़कर ही समझा जा सकता है कि इस दुनिया को बाक़ी समाज, जिस निर्मम क्रूरता से 'डील' करता है वही क्रूरता इनमें हर स्तर पर 'इनवर्ट' होती रहती है। उनकी ज़िन्दगी का हर पाठ आत्मदंड, आत्मक्रूरता, चिर यातना का पाठ है। यह हिन्दी का एक साहसी उपन्यास है जो जेंडर के इस अकेलेपन और जेंडर के अलगाव के बावजूद समाज में सम्मान से जीने की ललक। से भरपूर दुनिया का परिचय कराता है। -सुधीश पचौरी

About the writer

PRADEEP SAURABH

PRADEEP SAURABH निजी जीवन में खरी-खोटी हर खूबियों से लैस। मौन में तर्कों का पहाड़ लिये कब, कहाँ और कितना जिया, इसका हिसाब-किताब कभी नहीं रखा। बँधी-बँधाई लीक पर कभी नहीं चले। कानपुर में जन्मे लेकिन लम्बा समय इलाहाबाद में गुजारा। वहीं विश्वविद्यालय से एमए किया। जन-आन्दोलनों में हिस्सा लिया। कई बार जेल गये। कई नौकरियाँ करते-छोड़ते दिल्ली पहुँच कर साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादकीय विभाग से जुड़े। कलम से तनिक भी ऊबे तो कैमरे की आँख से बहुत कुछ देखा। कई बडे़ शहरों में फोटो प्रदर्शनी लगाई। मूड आया तो चित्रांकन भी किया। पत्रकारिता में पच्चीस वर्षों से अधिक समय पूर्वोत्तर सहित देश के कई राज्यों में गुजारा। गुजरात दंगों की रिपोर्टिंग के लिए पुरस्कृत हुए। देश का पहला बच्चों का हिन्दी का अखबार निकाला। पंजाब के आतंकवाद और बिहार के बँधुआ मजदूरों पर बनी फिल्मों के लिए शोध। ‘बसेरा’ टीवी धारावाहिक के मीडिया सलाहकार रहे। दक्षिण से लेकर उत्तनर तक के कई विश्वविद्यालयों में उपन्यासों पर शोध। इनके हिस्से ‘मुन्नी मोबाइल’, ‘तीसरी ताली’ और देश ‘भीतर देश’ उपन्यासों के अलावा कविता, बच्चों की कहानी और सम्पादित आलोचना की पाँच पुस्तकें हैं। उपन्यास ‘तीसरी ताली’ के लिए अन्तरराष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान से ब्रिटिश संसद में सम्मानित।

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality