Sarvhara Raaten

Original Book/Language: सर्वहारा रातें

Format:Paper Back

ISBN:978-93-86799-78-4

Author:ABHAY KUMAR DUBEY

Translation:उन्नीसवीं सदी के फ्रांसीसी मज़दूरों के जीवन और राजनीति को केंद्र, बना कर ज़ाक राँसिएर द्वारा रचे गए इस ग्रंथ 'सर्वहारा रातें' का। प्रकाशन सत्ताइस साल पहले फ्रांस में ला नुई दे प्रोलेतेह' के रूप में हुआ था। इसे पढ़ते वक्त हिंदी पाठकों के दिमाग में कई सवाल उठेंगे। सर्वहारा रातों की यह पेचीदगी हिंदी पाठकों को दिखाएगी कि एक तरफ़ कम्युनिस्ट पार्टी जनता का वैज्ञानिक सत्य खोज़ कर उसे थमाना चाहती है, दूसरी तरफ़ पार्टी के बाहर खड़े हुए वामपंथी और रैडिकल बुद्धिजीवी जनता के सत्य के नाम पर उसकी नुमाइंदगी का दावा कर रहे हैं। एक तीसरी ताक़त भी है जो मजदूर वर्ग से ही निकली है : उसके शीर्ष पर बैठा हुआ उसका अपना प्रभुवर्ग। वह भी अपने हिसाब से मजदूरों को इतिहास के मंच पर एक ख़ास तरह की भूमिका में ढालना चाहता है। सर्वहारा जिस यूटोपिया के लिए संघर्ष कर रहा है, उसके प्रतिनिधित्व की इन कोशिशों का आख़िर आपस में क्या ताल्लुक है? नए समाज का सच्चा वाहक कौन है : वह मजदूर जो लोकप्रिय जन संस्कृति की शुद्धता कायम रखते हुए क्रांतिकारी गीत गा रहा है, या वह जो बूर्वा वर्ग की भाषा में कविता लिखने की कोशिश कर रहा है? श्रम की महिमा का गुणगान करने वाला मजदूर। अधिक बगावती है, या मेहनत-मशक्कत की ज़िन्दगी को अपने बौद्धिक विकास में बाधक मानने वाला मज़दूर ज्यादा बड़ा विद्रोही है? कुल मिला कर यह किताब सर्वहारा वर्ग की चेतना के रैडिकल यानी परिवर्तनकामी सार की नए सिरे से शिनाख़्त करना चाहती है। वह न तो माक्र्स के इस आकलन से सहमत है कि केवल आधुनिक पूँजीवाद के कारखानों में अनुशासित हो कर ही मजदूर अपनी मुक्ति की वैज्ञानिक चेतना से लैस हो सकता है, और न ही वह समाजवादी । विचार का बुनियादी स्रोत दस्तकार-श्रमिकों के जीवन और भाषा में खोजने की परियोजना की पैरोकार है। यह किताब कहती है कि मजदूर तो कुछ और ही चाहता है। बग़ावत करने की उसकी वजहें कुछ और ही हैं। सर्वहारा रातें' मजदूर की जिंदगी के इस कुछ और' ही का पता लगाने की कोशिश करती हुई नज़र आती है।

Pages:

MRP:Rs.325/-

Stock:In Stock

Rs.325/-

Details

सर्वहारा रातें

Additional Information

उन्नीसवीं सदी के फ्रांसीसी मज़दूरों के जीवन और राजनीति को केंद्र, बना कर ज़ाक राँसिएर द्वारा रचे गए इस ग्रंथ 'सर्वहारा रातें' का। प्रकाशन सत्ताइस साल पहले फ्रांस में ला नुई दे प्रोलेतेह' के रूप में हुआ था। इसे पढ़ते वक्त हिंदी पाठकों के दिमाग में कई सवाल उठेंगे। सर्वहारा रातों की यह पेचीदगी हिंदी पाठकों को दिखाएगी कि एक तरफ़ कम्युनिस्ट पार्टी जनता का वैज्ञानिक सत्य खोज़ कर उसे थमाना चाहती है, दूसरी तरफ़ पार्टी के बाहर खड़े हुए वामपंथी और रैडिकल बुद्धिजीवी जनता के सत्य के नाम पर उसकी नुमाइंदगी का दावा कर रहे हैं। एक तीसरी ताक़त भी है जो मजदूर वर्ग से ही निकली है : उसके शीर्ष पर बैठा हुआ उसका अपना प्रभुवर्ग। वह भी अपने हिसाब से मजदूरों को इतिहास के मंच पर एक ख़ास तरह की भूमिका में ढालना चाहता है। सर्वहारा जिस यूटोपिया के लिए संघर्ष कर रहा है, उसके प्रतिनिधित्व की इन कोशिशों का आख़िर आपस में क्या ताल्लुक है? नए समाज का सच्चा वाहक कौन है : वह मजदूर जो लोकप्रिय जन संस्कृति की शुद्धता कायम रखते हुए क्रांतिकारी गीत गा रहा है, या वह जो बूर्वा वर्ग की भाषा में कविता लिखने की कोशिश कर रहा है? श्रम की महिमा का गुणगान करने वाला मजदूर। अधिक बगावती है, या मेहनत-मशक्कत की ज़िन्दगी को अपने बौद्धिक विकास में बाधक मानने वाला मज़दूर ज्यादा बड़ा विद्रोही है? कुल मिला कर यह किताब सर्वहारा वर्ग की चेतना के रैडिकल यानी परिवर्तनकामी सार की नए सिरे से शिनाख़्त करना चाहती है। वह न तो माक्र्स के इस आकलन से सहमत है कि केवल आधुनिक पूँजीवाद के कारखानों में अनुशासित हो कर ही मजदूर अपनी मुक्ति की वैज्ञानिक चेतना से लैस हो सकता है, और न ही वह समाजवादी । विचार का बुनियादी स्रोत दस्तकार-श्रमिकों के जीवन और भाषा में खोजने की परियोजना की पैरोकार है। यह किताब कहती है कि मजदूर तो कुछ और ही चाहता है। बग़ावत करने की उसकी वजहें कुछ और ही हैं। सर्वहारा रातें' मजदूर की जिंदगी के इस कुछ और' ही का पता लगाने की कोशिश करती हुई नज़र आती है।

About the writer

ABHAY KUMAR DUBEY

ABHAY KUMAR DUBEY विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में $फेलो और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक। पिछले दस साल से हिंदी-रचनाशीलता और आधुनिक विचारों की अन्योन्यक्रिया का अध्ययन। साहित्यिक रचनाओं को समाजवैज्ञानिक दृष्टि से परखने का प्रयास। समाज-विज्ञान को हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में लाने की परियोजना के तहत पंद्रह ग्रंथों का सम्पादन और प्रस्तुति। कई विख्यात विद्वानों की रचनाओं के अनुवाद। समाज-विज्ञान और मानविकी की पूर्व-समीक्षित पत्रिका प्रतिमान समय समाज संस्कृति के सम्पादक। पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन और टीवी चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में नियमित भागीदारी।

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality