Bhartiya Bhashaon Mein Ramkatha : Sanskrit Bhasha

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-8868-468-2

Author:Dr. Prabhakar Singh

Pages:184

MRP:Rs.595/-

Stock:In Stock

Rs.595/-

Details

भारतीय संस्कृति के विभाजन को केन्द्र में रखते हुए भारतीय भाषाओं एवं राज्यों को पृथक्-पृथक् खण्डों में बाँटने वाले विदेशी राजतन्त्रों के कारण भारत बराबर टूटते हुए भी अपने सांस्कृतिक सन्दर्भो के कारण अब भी एक सूत्र में बँधा है। एकता के सूत्र में बाँधने वाले सन्दर्भो में राम, कृष्ण, शिव आदि के सन्दर्भ अक्षय हैं। भारतीय संस्कृति अपने आदिकाल से ही राममयी लोकमयता की पारम्परिक उदारता से जुड़ी सम्पूर्ण देश और उसके विविध प्रदेशों एवं उनकी लोक व्यवहार की भाषाओं में लोकाचरण एवं सम्बद्ध क्रियाकलापों से अनिवार्यतः हज़ारों-हज़ारों वर्षों से एकमेव रही है। सम्पूर्ण भारत तथा उसकी समन्वयी चेतना से पूर्णतः इस भारतीय अस्मिता को पुनः भारतीयों के सामने रखना और इसका बोध कराना कि पश्चिमी सभ्यता के विविध रूपों से आक्रान्त हम भारतीय अपनी अस्मिता से अपने को पुनः अलंकृत करें। भारतीय भाषाओं में रामकथा को जन-जन तक पहुँचाने का यह हमारा विनम्र प्रयास है। संस्कृत भाषा में ‘रामकथा' पर विपुल लेखन हुआ है। ‘रामकथा' परम्परा की यह सर्वाधिक समृद्ध साहित्य धारा है। आदिकवि ‘वाल्मीकि के ‘रामायण' को संस्कृत में ‘रामकथा' का आदिकाव्य माना जाता है। ‘रामायण' की परम्परा में संस्कृत में काव्य, नाटक, कथा और अन्य साहित्यिक विधाओं में विभिन्न रचनाएँ रची गयीं। यहाँ ‘रामकथा' की इसी समृद्ध परम्परा का विवेचन करते हुए। पुस्तक में रामकथा पर आधारित प्रमुख कृतियों का वैचारिक एवं शोधपरक विश्लेषण भी किया गया है।

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About the writer

Dr. Prabhakar Singh

Dr. Prabhakar Singh डॉ. प्रभाकर सिंह इलाहाबाद ज़िले में मानपुर गाँव में सन् 1979 में जन्म। इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा गाँव से। बी.ए., एम.ए. और डी.फिल. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद से। उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से प्रवक्ता के रूप में चयनित होकर वर्ष 2004-2005 ई. तक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पट्टी, प्रतापगढ़ में अध्यापन कार्य। वर्ष 2005 ई. से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन। लगभग 50 आलेख और समीक्षाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुस्तकों में 20 से अधिक अध्यायों का प्रकाशन। ‘ई-पाठशाला’, ‘हिन्दी साहित्य कोश' और उ.प्र. राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय में विभिन्न पाठ्य सामग्रियों का प्रकाशन हेतु चयन। कुछ कविताएँ भी प्रकाशित। ‘उपन्यास : मूल्यांकन के नये आयाम’ और ‘रीतिकाव्य : मूल्यांकन के नये आयाम सम्पादित पुस्तकों का प्रकाशन। ‘आधुनिक साहित्यः विकास और विमर्श' पुस्तक प्रकाशित। ‘साहित्य का इतिहास लेखन : परम्परा और इतिहास-दृष्टि’ पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य। इन दिनों ‘भाषा-विमर्श' और ‘रीतिकाव्य' पर शोध कार्य।

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